PAARAD SIDDH SOUNDARYA KANKAN ( ... )
पारद पर अज हमारे मध्य आतने लेख और पोस्ट अ चुके हैं की ऄब कोइ भी आस धातु को
जो की जीवित जाग्रत तरल हैं ईसके वदव्य गुणों के प्रवत ऄवनवभज्ञता नही रख सकता हैं,
हमने ऄपने आस ब्लॉग और तंत्र कौमुदी के माध्यम से साथ ही साथ फेसबुक के ग्रुप के
माध्यम से आस पर ऄत्यंत सरल भाषा मे ऄनेको पोस्ट प्रकावित की हैं .हलावक यह सारा
कायय सदगुरुदेि जी ने ऄपनी पवत्रका मंत्र तंत्र यंत्र विज्ञानं के माध्यम से बहुत िषों पहले प्रारंभ
कर चुके हैं.ईन्होंने स्ियं न केबल लेख वलख कर बवकक ईनके द्वारा अयोवजत विविरों मे
ईन्होंने स्ियं प्रायोवगक रूप से आन बातो को समझाया बवकक केसे संभि हो सकता हैं आनका
वनमायण ... यह कर के वदखाया भी .
बात ईठती हैं की पारद एक वदव्यतम धातु हैं, और ईसके क्षमताओ की सीमा ही नही पर
कहने की ऄपेक्षा जब विविष्ट संस्कार करके वबवभन्न मंत्रात्मक और तंत्रात्मक प्रवियाओं से
गुजरने के बाद ही पारा ..पारद मे और वफर विविष्टं गुवटकाओ मे बदलने की वस्तवथ मे अ
पाता हैं, वफर ईसे िेधन क्षमता युक्त करना पर ... मात्र िेधन क्षमता प्राप्त होने से सभी जन
सामान्य का ककयाण संभि नहीं हे,
आसी वलए सदाविि ने बद्ध पारद को ऄनंत क्षमता का
अिीियचन वदया. आसी वलए यह देिताओं के द्वारा भी पूवजत हे.
सकलसुरमुवनदरेिेवद सियईपास्य तः िंभु बीजं
सभी ऊवषमुवनयों तथा सुर ऄथायत देिताओ देिगणों के द्वारा पूवजत यह िंभुबीज ऄथायत
वििबीज पारद हे. जो देिताओ के द्वारा ईपास्य हे ईसकी ईपासना भला मनुष्य को क्या प्रदान
नहीं कर सकती हे.
अप मे से ऄनेको ने यह विविष्ट गुटीकाए/विग्रह /कंकण प्राप्त वकये हैं और आनके लाभों
को ऄपने वदन प्रवतवदन के जीिन मे देख कर अश्चयय चवकत भी हुये हैं .
जब बात सौंदयय की हो तो ..ईसकी पररभाषा मे सारा विश्व ही अ जाता हैं .क्योंवक
सत्यम
वििम सुन्दरम की धारणा तो भारतीय मानस मे पहले से हैं .तो सौंदयय तो जीिन का
अधार हैं.और वबना सौंदयय के जीिन का कोइ ऄथय नही ..और पारद का संयोग ऄगर आन
सब बातों मे हो जाए तो वफर क्या कहना .
पर पारद का संयोग साधना क्षेत्र के माध्यम से ही
आस ओर हो सकता हैं,
जहााँ बात सौंदयय साधनाओ की अये तब वनश्चय ही िहां पर
ऄप्सरा, यवक्षणी, गन्धिय कन्याए , वकन्नरी अवद का वििरण न अये यह केसे हो सकता हैं
.क्योंवक ऄगर सच मे सौंदयय को समझना हैं, जानना हैं, और ऄनुभि करना हैं तो आन
साधनाओ को देखना पड़ेगा ही अत्मसात करना पड़ेगा ही
पर यह ऄत्यन्त सरल सी लगने
िाली साधनाए ..िास्ति मे आतनी सरल हैं नही .क्योंवक वकन्ही एक की साधना से हमें जो
लाभ प्राप्त हो सकते हैं िायद ईनके ऄलग ऄलग ऄनेको साधनाए करनी पड़े.और यह
सत्य भी तो हैं .पर आन सरल सी लगने िाली साधनाओ मे सफलता बहुत कम को वमली
हैं ,कारण हैं की आनके गोपनीय सूत्रों का साधको मे न जानकारी होना और वजनके पास
जानकारी भी तो ..ईन्होंने कृपण भाि बनाए रखा .
तो साधनाओ के प्रवत क्या रुझान रख जाए .आसी बात को ऄपने मन मे रख कर एक ... एक
वदिसीय
ऄप्सरा यवक्षणी साधना रहस्य एिं सूत्र पर अधाररत सेमीनार
का अयोजन वकया
गया .अप सभी के द्वारा वजस ईत्साह पूियक माहौल मे आसका अयोजन हुअ िह तो एक
ऄलग ही तत्ि हैं ...अप सभी के
वलए ऄप्सरा यवक्षणी रहस्य खंड वकताब
और ईस
बहु
प्रतीवक्षत पूणय यवक्षणी ऄप्सरा सायुज्जज्जय षष्ठ मंडल यन्त्र
का प्राप्त होना वजस यन्त्र पर कोइ
भी
ऄप्सरा यवक्षणी की साधना के साथ साथ सौंदयय साधना,सम्मोहन साधना,कुबेर
साधना,विि साधना,अकषयण साधना भी असानी से समपन्न की जा सकती हैं
.और
प्रसन्नता के आन्ही क्षणों मे अररफ भाइ जी द्वारा घोवषत वकया गया की ..ईनकी तरफ से
एक ऄद्व्तीय ईपहार जो आस सेमीनार मे भाग लेने िालों सभी व्यवक्तयों के वलए
वनिुक्ल रहा हैं, ईपलब्ध कराया गया .वजसका नाम
पारद सौंदयय कंकण
हैं .
पर पारद गुवटका/या आस कंकण का आतना महत्त्ि हैं ही क्यों ?
रस वसवद्ध के ऄंतगयत पारद के दुलयभ विग्रह तथा गुवटकाओ कंकण का वििरण तो हे लेवकन
आनकी प्रावप्त सहज नहीं हे क्योंकी आनके वनमायण से सबंवधत सभी प्रवियाए ऄत्यवधक गुढ़ तथा
दुस्कर रही हे. सदगुरुदेि ने ऐसी विविध गुवटकाओ के बारे में विविरण प्रदान वकया तथा ईनके
वनमायण पद्धवत को जनसामान्य के मध्य रखा तथा िे ऄपने स्ियं के वनदियन में ऐसी गुवटकाओ
तथा विग्रहों का वनमायण कराते थे.
मोह्येधः परान बद्धो वजव्येच्छ्मृतः परान मूवच्छछयतोबोध्येद्न्यन तं सुतं कोन सेिते
‚ जो खुद बद्ध हो कर दूसरो को बााँध देता हे ऄथायत ठोस विग्रह या गुवटका रूप में जो पारद
बद्ध हो जाता हे, िह दूसरों को बााँध देता हे, ऄथायत वकसी को भी सम्मोवहत करने का,
अकवषयत करना का, ििीभूत करने का गुण धारण कर लेता हे, वकसी भी देिी, देिता या
देिगण को प्रत्यक्ष ईपवस्थत कर सकता हे; जो खुद मृत हो कर दूसरों को जीिन देता हे, ऄथायत
भस्म के रूप में या ऄपने अप की गवत को बद्ध कर स्ियं की ईजाय स्ियं के वलए ना ईपयोग
कर ऄपने साधक को प्रदान कर नूतन जीिन प्रदान करता हे, जो खुद ही मूवछयत हो कर ऄथायत
ऄपनी गवत, मवत को रोक कर ठोस रूप बन कर विविध गुढ़ ज्ञान का साधक को प्रदान करता
हे ऐसे दुलयभ तथा रहस्यमय पारद की प्रावप्त कोन ज्ञानी नहीं करना चाहेगा?‛
आस देि दुलयभ पारद सौंदयय कंकण के कुछ गुण और लाभ अप सभी के वलए ..आस प्रकार से
हैं .
ईन्होंने आस कंकण की वििेषता बताते हुये कहा की सबसे पहले तो यह की तंत्र
कौमुदी मे अये हुये
यवक्षणी सायुज्जज्जय गुवटका
की जगह आस
पारद सौंदयय कंकण
का
प्रयोग वकया जा सकता हैं .हालावक ईस गुवटका के ऄन्य प्रयोग भी हैं .और िह बहुत
ऄवधक मूकयिान भी हैं .पर ईसके लाभ आस कंकण से भी प्राप्त वकये जा सकते हैं .... और
जब बात सौंदयय तथा श्ृंगार की हो तो
पारद वसद्ध सौंदयय कंकण
का ईकलेख ऄवनिायय ही हे.
आसी गुवटका को
पारद वसद्ध सौंदयय कंकण, रस वसद्ध सौंदयय कंकण या रसेंद्र सौंदयय कंकण
कहा
गया हे,
दूसरी गुवटकाओ के मुकाबले भले आस गुवटका में लागत कम लगती हे लेवकन आसका
महत्त्ि और साधनात्मक ईपयोवगता को ज़रा सा भी कम अाँका नहीं जा सकता.
सौंदयय कंकण पारद गुवटकाओ की श्ेणी में एक ऄवत वििेष गुवटका हे वजसका अकार बड़ा
नहीं होता हे, लेवकन वजसके उपर कइ प्रकार के प्रयोग सम्प्पन वकये जा सकते हे. मूलतः यह
सौंदयय तथा अकषयण गुवटकाओ के ऄंतगयत हे.
सौंदयय का ऄथय यहााँ पर मात्र व्यवक्त के सौंदयय से
नहीं बवकक व्यवक्त के पूणय जीिन तथा ईससे सबंवधत सभी पक्षों के सौंदयय से हे तथा अकषयण
का भी ऄथय यहााँ पर देह से वनसृत होने िाले अकषयण मात्र से ना हो कर वकसी भी व्यवक्त या
देियोनी के अकषयण से भी हे.
ऄगर व्यवक्त ऄपने जीिन में ऐसी अकषयण क्षमता को प्राप्त कर
ले की देिता भी ईससे अकवषयत होने लगे वफर जीिन में रस ईमंग तथा सुख भोग होना तो
स्िाभाविक हे.
साथ ही साथ यह ऄपने अप मे
एक पारद वििवलंग का भी कायय करेगी .यह सही हैं की
एक पूणय पारद वििवलंग एक पारद वििवलंग ही हैं .पर आसका ईपयोग भी ईस तरह से
वकया जा सकता हैं .
सौंदयय कंकण के बारे में जेसे कहा गया हे, िह पूणय अकषयण क्षमता से युक्त होता हे. ऄतः
वकसी भी व्यवक्त वििेष के अकषयण प्रयोग को आस गुवटका के सामने करने पर ईसका वििेष
प्रभाि होना स्िाभाविक हे.
साथ ही साथ वकसी भी देिी तथा देिता की साधना में आस गुवटका
का होना सौभाग्य सूचक हे क्यों की तीव्र अकषयण क्षमता के माध्यम से यह वकसी भी देिी
तथा देिता का भी यह गुवटका अकषयण कर सकती हे.
या वकसी भी प्रकार के
काम्य चाहे िह धनप्रावप्त हो या वफर घर में सुख िांवत से सबंवधत प्रयोग
हो,
काम्य प्रयोग का ऄथय ही होता हे की गुढ़ िवक्त का अकषयण कर के साधना में ऄभीष्ट को
प्राप्त करना या मनोकामना को पूणय करना, ऄगर ऐसे वकसी भी प्रकार के काम्य प्रयोग में आस
गुवटका का ईपयोग वकया जाए तो
ऄथायत गुवटका को रख कर मंत्र जप वकया जाए तो प्रयोग में
वजस िवक्त का प्रभाि हे, ईस पर अकषयण होता हे तथा मंत्र का प्रभाि कइ गुना बढ़ जाता हे.
ऄभीष्ट की प्रावप्त की संभािना ऄवत तीव्र हो जाती हे.
आसी प्रकार वकसी भी
ििीकरण साधना में भी आस गुवटका को ऄपने सामने स्थावपत करने पर
साधक को वनश्चय ही लाभ प्रावप्त
की और छलांग लगाता हे.
वकसी भी प्रकार की सौंदयय साधनाओ में यह देि योनी के साक्षात्कार में साधक को पूणय
सहयोग प्रदान करती हे.
ऄप्सरा, यवक्षणी, वकन्नरी, गन्धियकन्या अवद की साधना चाहे िह
ईनके प्रत्यक्ष साहचयय के वलए हो या वफर ईनके माध्यम से ऄप्रत्यक्ष रूप से धन, ऐश्वयय,
भौवतक ईन्नवत को प्राप्त करना, दोनों ही रूप में सौंदयय कंकण साधना... साध्य ऄप्सरा यवक्षणी
या दूसरी योनी के प्रत्यक्ष ऄप्रत्यक्ष रूप से साधक को तीव्रतम रूप से वनकट लाने के वलए कायय
करता हे
.
आस गुवटका में प्रवतष्ठा तथा स्थापन संस्कार विि िवक्त सायुज्जज मंत्रो के माध्यम से वकया जाता
हे. ऄतः मूल रूप से यह विि तथा िवक्त का समवन्ित स्िरुप ही
हे आस वलए आस पर वकसी भी
प्रकार की कोइ भी विि ऄथायत कोइ भी देिगण या देिता की साधना और कोइ भी िवक्त
साधना की जा सकती हे. आसके ऄलािा आस गुवटका का सबंध चि देिताओं के साथ हे,
कुण्डवलनी से सबंवधत साधनाओ को आस कंकण के सामने करने से वनश्चय ही कइ साधक के
लाभों में िृवद्ध होती ही हे
.
िेभि प्रावप्त से सबंवधत वििेष लाभ प्राप्त करने के वलए वजन साधनाओ का ईकलेख होता हे िे
कुबेर साधना, आंद्रसाधना, ऄष्टल्मी साधना जेसे प्रयोग आस कंकण के सामने करने पर साधक
को लाभ तीव्रता से प्राप्त होता हे क्यों की कोषाध्यक्ष तथा देिराज स्थापन प्रविया जेसी गुढ़
वियाए आस गुवटका पर प्राणप्रवतष्ठा के समय ही संम्पन की जा चुकी होती हे.
आस गुवटका की सब से बड़ी वििेषता यह भी कही जा सकती हे
की यह गुवटका साधक को
कोइ भी देिी देिता से सबंवधत कोइ भी प्रयोग को करने पर साधक की सफलता की
संभािनाओं तीव्रता पूियक बढ़ा देता हे.
लेवकन साथ ही साथ एक वििेष तथ्य यह भी हे की
साधक आसके माध्यम से जीिन भर लाभ
ईठा सकता हे, आसको प्रिावहत या विसवजयत करने की अिश्यकता नहीं होती.
या ऐसा भी नहीं
हे की वकसी एक वनवश्चत योनी, या देिी देिता की ही साधना आस गुवटका पर हो सकती हे.
ऄगर साधक
यवक्षणी साधना कर रहा हे तब भी आस गुवटका का ईपयोग िह कइ कइ बार
ऄलग ऄलग यवक्षणी साधनाओ के वलए कर सकता हे.
सौंदयय कंकण के बारे में उपर वजतने भी तथ्य हे िह चुने हुिे मुख्य तथ्य ही हे, आसके ऄलािा
भी आसके कइ कइ लाभ साधक को वनत्य जीिन में प्राप्त होते रहते हे,
गृहस्थ सुख, कायय क्षेत्र में
ऄनुकूलता, व्यापर अवद में ईन्नवत आत्यावद कइ प्रकार से यह गुवटका साधक को लाभ प्रदान
करने में समथय हे.
वनश्चय ही ऐसे
कइ रहस्यमय पदाथय आस श्ृवष्ट में हे वजसके माध्यम से व्यवक्त ऄपने जीिन को
ईध्ियगामी बनाने के प्रयासों में देि बल तथा देि योग को जोड़ कर ईसी कायय को तीव्रता के
साथ सम्प्पन कर लाभ को प्राप्त कर सकता हे.
पारद से सबंवधत सभी गुवटकाओ की ऄपनी
ऄपनी वििेषता तथा महत्त्ि हे हालााँवक ईनके महत्त्ि को िब्द के माध्यम से ऄवभव्यवक्त
वकतनी भी की जाए कम ही पड़ती हे.
पारद वसद्ध सौंदयय कंकण के बारे में ऄप्सरा यवक्षणी साधना पर एक वदिसीय सेमीनार में कुछ
चचाय हुइ थी तथा आसके रहस्यमय तथा गुढ़ पक्ष और िम के बारे में कुछ तथ्यों के सभी भाइ
बवहनों के सामने रखा था.
और
यह कंकण केबल मात्र ईस सेमीनार मे भाग वलए हुये व्यवक्तयों के वलए ही
ईपलब्ध रही .
बाद मे ऄनेको भाइ बवहनों ने आस दुलयभ सौंदयय कंकण को केसे प्राप्त वकया
जा सकता हैं ईसके वलए वलखा पर हमारे द्वारा आस विषय मे मौन ही रखा गया .
क्योंवक .यह
तो ऄवत विविष्ट स्तर की गुवटका/कंकण के वलए जब तक सदगुरुदेि जी के सन्यािी विष्य
विष्याओ द्वारा ऄनुमवत नही वमल जाये की.. सभी को ईपलब्ध कराइ जा सकती हैं .हम
केसे ऄपनी ओर से कुछ भी कह सकते हैं .
और वजन भी भाइ बवहनों ने जो आस सेमीनार मे भाग नही ले पाए हैं,ईन्होंने आसमें प्रकावित
होने िाली वकताब ‚ऄप्सरा यवक्षणी रहस्य खंड ‚ को प्राप्त वकया हैं हम ईन्हें भी यह
गुवटका ईपलब्ध नही करा पाए हैं .हालावक ईन सभी ने यह वलखा था की िे वकसी भी
कीमत पर आसको प्राप्त करना चाहेंगे .
पर यहााँ बात कीमत की नही बवकक ऄनुमवत की हैं .
यहााँ सौंदयय कंकण की कीमत पारद की ऄन्य गुवटकाओ की कीमत की तुलना मे बहुत
कम हैं .और .यह हमारा सौभाग्य हैं की वजन्होंने भी आसके बारे मे पढ़ा हैं, या सुना हैं. या जो
भी आसको प्राप्त करना चाहते हैं,ईनके वलए यह एक ऄिसर हैं की आस देि दुलयभ गुवटका
को प्राप्त कर सकते हैं .
क्योंवक आसके लाभ से अप ऄिगत हो ही चुके हैं .यह वसफय आसवलए ईपलब्ध हो पा रही हैं
की िस् आसे सौभाग्य कहा जा सकता हैं .
अप मे से वजन को भी यह गुवटका प्राप्त करना हो ..वजनको भी ऄप्सरा यवक्षणी साधना मे
पूणयता प्राप्त करना हो ईसमे यह सहयोगी कारक कंकण ..और जो भी उपर बताये लाभों को
प्राप्त करना चाहते हो ईन्हें यह ऄिसर का लाभ ईठाना ही चावहये .
क्योंवक आस तरह से
संस्कार युक्त कोइ भी पारद विग्रह प्राप्त करना ऄपने अप मे भगिान
िंकर का मानो घर पर स्थापन और पारद मे स्ित ही ल्मी तत्ि रहता हैं, ईस ल्मी तत्ि
का अपके घर पर स्थापन हैं और साधना समय मे एक आस तरह के ईच्छच कोवट का पारद
कंकण अपके सामने रहेगा तो स्ित ही अपके ऄंत: िरीर मे सू्म पररितयन प्रारंभ होने
लगेगे, जो की ...या वजनका प्रारंभ होना मानो जीिन मे साधना सफलता के वलए एक द्वार
सा खुल जाना हैं
.
ऄतः ऄब और ऄवधक क्या वलखा जाए .वसफय आतना ही की ...जो समझदार हैं , ज्ञानिान हैं,
प्रज्ञा सम्पन्न हैं, समय का मूकय जानते हैं,ईनके वलए तो आिारा काफी हैं .िेष जो
ऄवतबुवद्धमान हैं ..ईन्हें क्या और वलखा जाए ..
अप मे से जो भी आस गुवटका को प्राप्त करना चाहे िह
[email protected]
पर आ मेल कर और भी जानकारी ले सकते हैं .हााँ आ मेल के विषय मे ...पारद सौंदयय कंकण
ऄिश्य वलख दे ..
SOME NECESSARY FACTS REGARDING YAKSHINI SADHNA PART 5( 5)
यवक्षणी साधना के पररपेक्ष में ऄब तक हमने जाना की वकस प्रकार अकाि मंडल की
अिश्यकता क्या हे तथा आसमें िोध बीज और िोध मुद्रा का वकस प्रकार से संयोग
होता हे. तथा जेन तंत्र पद्धवत में यक्ष तथा यवक्षणी के सबंध में वकस प्रकार ऄनेको
तथ्य हे. आसके ऄलािा भगिान मवणभद्र की साधना का यवक्षणी साधना से क्या सबंध
हे. ऄब हम यहााँ पर वििेष चचाय करेंगे यक्षमंडल स्थापन प्रयोग की. क्यों की यह
प्रयोग जेन तंत्र पद्धवत का गुप्त तथा महत्िपूणय प्रयोग हे. आस प्रयोग के माध्यम से साधक
वनवश्चत रूप से यवक्षणी साधना में सफलता की और ऄग्रसर हो सकता हे.
यह प्रयोग भी यवक्षणी साधना संयुक्त ऄथायत िोध बीज युक्त िायु मंडल पर वकया
जाता हे. आस प्रयोग के ऄंतगयत साधक को सिय प्रथम २४ यक्ष, २४ यवक्षणी तथा २४
तीथंकरों का स्थापन यन्त्र में करना रहता हे. यह स्थापन वििेष मंत्रो के द्वारा होता हे.
यह पूणय यक्ष मंडल हे. २४ यक्ष वजनके बारे में जेन तन्त्रो में ईकलेख हे िह सभी यक्ष के
बारे में यही धारणा हे की ईन सभी देिो का यक्षलोक में महत्िपूणय स्थान हे. यही बात
२४ यवक्षणी के बारे में भी हे. तथा २४ तीथंकर ऄथायत जेन धमय के अवद महापुरुषों के
अिीष के वबना यह केसे संभि हो सकता हे. ऄतः ईनका स्थापन भी वनतांत
अिश्यक हे ही. आसके बाद यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग मंत्र का जाप वकया जाता हे
वजसके माध्यम से यन्त्र में स्थावपत देिता को स्थान प्राप्त होता हे तथा यन्त्र पूणय
चेतन्यता को प्राप्त कर सके. आसके बाद साधक को यवक्षणी वसवद्ध मंत्र का जाप करना
रहता हे. आस मंत्र जाप से अकाि मंडल में स्थावपत यक्षमंडल को साधक की
ऄवभलाषा का ज्ञान हो जाता हे तथा साधक एक रूप से मंत्रो के माध्यम से यवक्षणी
वसवद्ध की कामनापूवतय हेतु प्राथयना करता हे.
आस मंत्र जाप के बाद साधक पूजन अवद प्रवियाओ को करता हे तथा आस प्रकार यह
प्रयोग पूणय होता हे. या यु कहे की यह िम पूणय होता हे. वजसमे अकािमंडल का
वनमायण और स्थापन, आसके बाद मवणभद्र देि प्रिन्न प्रयोग तथा ऄंत में यक्ष मंडल
स्थापन प्रयोग वकया जाता हे. यह प्रविया साधक के यवक्षणी साधना के द्वार खोल
देती हे. और यह काम्य प्रविया हे ऄथायत जब भी कोइ भी यवक्षणी साधना करनी हो
तो आस अकािमंडल के सामने आससे सबंवधत एक वििेष मंत्र का ११ माला ईच्छचारण
कर साधना करने से साधक सबंवधत यवक्षणी का ििीकरण करने में समथय हो जाता हे.
यवक्षणी साधना से सबंवधत ऐसे कइ दुलयभ तथा गुह्यतम विद्धान हे वजनको ऄपना कर
साधक ऄपने ल्य की और ऄपनी पूणय क्षमता के साथ गवतिील हो सकता हे. ऐसे
कइ विधान जो वसफय गुरु मुखी हे तथा ईनका ज्ञान मात्र गुरुमुखी प्रणाली से ही हो
सकता हे. हमारी सदेि कोविि रही हे की हम वमल कर ईस प्रकार के ज्ञान को सब के
सामने ला पाए. और जहां तक बात सेमीनार की हे तो कुछ तथ्य वनवश्चत रूप से हरएक
व्यवक्त के सामने रखने के योग्य नहीं होते हे, वजनकी रूवच हो, वजनका ल्य हो ईनके
सामने मात्र ही ईन तथ्यों को रखा जाए तब साधक की , ईस साधना की, ईस प्रविया
की तथा ईस गुरुमुख से प्राप्त प्रविया से सबंवधत रहस्यिाद की गररमा बनी रह सकती
हे, क्यों की ऄगर यह महत्िपूणय नहीं होता तो अज कुछ भी गुप्त होता ही नहीं, और
ऄगर सब कुंजी या गुढ़ प्रवियाए प्रकाि में होती तो िो भी ईपेक्षा ग्रस्त हो कर एक
सामान्य सी प्रविया मात्र बन जाती तथा ईसकी ना कोइ महत्ता होती न ही वकसी भी
प्रकार गूढाथय. रहस्यों को प्रकाि में लाना ईतना ही ज़रुरी हे वजतना की ईनकी
प्रवियाओ को समजना और आन सब के मूल में होता हे योग्य पात्र. वजनमे लोलुपता हे
िह ज्ञान प्राप्त करने के वलए वकसी भी विपरीत पररवस्थवत यो में भी केसे भी गवतिील
हो कर ज्ञान को ऄवजयत करता ही हे. और ऐसे साधक को रहस्यों की प्रावप्त हो जाती हे
तथा िह ऄपना नाम सफल साधको की श्ेणी में ऄंवकत कर लेता हे. लेवकन आन सब
के मूल में भी एक तथ्य हे, ज्ञान प्रावप्त के तृष्णा. वजसको वजतनी ज्जयादा प्यास होगी िो
ईतना ही ज्जयादा प्रयत्निील रहता हे. और ज्ञान के क्षेत्र में तो ऄनंत ज्ञान हे ऄतः जो
अगे बढ़ कर वजतना प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा ईसको ईतना ज्ञान ऄिश्य रूप से
वमलता ही हे, वफर सदगुरुदेि का अिीष तो हम सब पर हे ही. तो साधनामय बन
सफलता को प्राप्त कर हम ईनके ऄधरों पर एक मुस्कान का कारण ही बन जाये तो एक
विष्य के वलए ईससे बड़ी वसवद्ध हो भी नहीं सकती.
SOME NECESSARY FACTS REGARDING YAKSHINI SADHNA PART 4( 4)
वपछले लेखो में हमने जाना वकस प्रकार साधना में तत्िों का महत्त्ि हे. वकस प्रकार से
अकाितत्ि की ऄवनिाययता हे ईसकी प्रवतकृवत स्िरुप मंडल क्यों ऄवनिायय हे, आसके ऄलािा
साधक में िीरभाि क्यों होना ज़रुरी हे और िीरभाि में िोध मुद्रा का ऄथय क्या होता हे.
वजस तरह अगम िाश्त्रो में सौंदयय साधनाओ का महत्त्ि हे ईसी प्रकार से दूसरे तंत्र मागय में भी
ऄप्सरा तथा यवक्षणी साधनाओ का भी ईतना ही अधार हे. चाहे िह बौद्ध धमं से सबंवधत
यमारी तंत्र हो या जेन तंत्र िाश्त्र. सभी में सौंदयय साधनाओ का ईकलेख हे तथा सौंदयय
साधनाओ का ईतना ही महत्िपूणय स्थान सभी जगह वनधायररत हे.
जेन तंत्र पद्धवत ऄपने अप में दुलयभ रहस्यमय तथा गुढ़ पद्धवत हे. और जहां पर हम बात यक्ष
लोक के सबंध में कर रहे हो तो जेन तंत्र का नाम ईकलेवखत करना अिश्यक ही नहीं ऄवनिायय
कहा जा सकता हे. जेन समाज का एक बहोत ही बड़ा योगदान हे यक्ष लोक से संपकय सूत्र
स्थावपत करने तथा ईससे सबंवधत तथ्यों को सब के सामने रखने का. महािीर स्िामी को २४
िे तीथंकर कहा जाता हे तथा ईनसे पहले के सभी तीथंकर के वलए भी यह बात स्िीकार की
जाती हे की सभी तीथंकरों के वलए एक यक्ष तथा एक यवक्षणी ने समय समय पर आंतज़ार वकया
हे. आसके ऄलािा पुरातन जेन ग्रंथो में कइ कइ जगह ऐसे ईदहारण प्राप्त होते हे वजनमे जेन
मुवनयों का संपकय यक्ष यवक्षणी तथा यक्ष लोक से रहा हे. जेन मुवनयों तथा तंत्र साधको के बारे
में वजन्होंने भी जानने की कोविि की होगी ईन्हें यह तथ्य वनवश्चत रूप से ज्ञात होगा की यक्षों के
पृथ्िी लोक पर जो गुप्त भिन हे ईनसे जेन मुवनयों तावन्त्रको का बहोत ही वनकटिती सबंध रहा
हे. कुछ सालो पूिय ही राजस्थान में ऐसे ही एक गुप्त भिन को एक जेन मुवन ने प्रकाि में लाने
का प्रयास वकया था साथ ही साथ ईन्होंने सब के सामने ईस भिन में प्रिेि कर के िहााँ से
ऄज्ञात धातुओ की तथा कीमती रत्नों की मुवतयया बहार वनकाल कर लोगो के सामने दियन हेतु
२-३ वदन रखी थी, जब िो भिन में कुछ और अगे गए थे तब ईनको यक्षों ने नम्र विनंती कर
रोक वलया था क्यों की िहााँ से ईनके वनगयदद्वार बने हुिे थे वजसके माध्यम से यक्ष लोक में सीधा
प्रिेि प्राप्त वकया जा सकता हे. सायद यह बात लोगो को ककपना लग सकती हे लेवकन आस
घटना के साक्षी सेकडो लोग रहे हे तथा ऐसे कइ ईदहारण हे जो की पुरातन नहीं हे. यहााँ पे हम
यह चचाय आस वलए कर रहे हे की यह ज्ञात हो पाए की अवखर िह कोनसा तथ्य वजसके माध्यम
से ईन योवगयो के वलए यह सहज संभि हो जाता हे.
जेन तांवत्रक ईपासना पद्धवत में कुछ देिी तथा देिताओ की साधना मुख्य रूप से होती हे.
पद्मािती, पाश्वयनाथ, घंटाकणय, मवणभद्र आत्यावद. ऄगर जेन आवतहास को योग्य रूप से जाना जाए
तो यह ज्ञात होता हे की आन सभी देिी देिताओ का सबंध यक्ष लोक से बताया जाता हे. तो
जब आन देिी तथा देिताओं की साधना ईपासना की जाती हे तब आनके वलए यक्ष लोक से
सबंध स्थावपत करना ईनके वलए सहज हो जाता हे. क्यों की यक्षलोक के मुख्य देिी तथा
देिताओ के अिीिायद की प्रावप्त िह कर लेते हे. यहााँ पर एक वििेष तथा ईकलेखनीय तथा
यह हे की मवणभद्र तांवत्रक साधना कइ प्रकार से जेन पद्धवत में होती रही हे तथा जेन तंत्र
साधको के मध्य ईनकी साधना ईपासना हमेिा ही अकषयण का केन्द्र रही हे क्यों की भगिान
मवणभद्र की साधना तीव्र रूप से फल प्रदान करती हे. आसके साथ ही साथ गोपनीय तथ्य यह
भी हे की भगिान मवणभद्र के साधक को ऄनायास ही धन की प्रावप्त होती रहती हे. आसके पीछे
का रहस्य यह हे की मवणभद्र साधना करने िाले साधक को यक्ष तथा यवक्षणी ऄद्रश्य रूप से
सहयोग प्रदान करती रहती हे. और ऐसा आस वलए होता हे क्यों की यक्षों की सेना के सेनापवत
भगिान मवणभद्र को माना गया हे और जेन तंत्र की धारणा ऄनुसार मवणभद्र देि का आस प्रकार
एक ऄवत महत्िपूणय स्थान यक्ष लोक में हे. आस वलए यवक्षणी साधना से पहले ऄगर मवणभद्र
देि से सबंवधत कोइ प्रयोग कर वलया जाए तो वनवश्चत रूप से सफलता की संभािना बढ़ जाती
हे. यूाँ भगिान मवणभद्र से सबंवधत कइ प्रयोग हे लेवकन गुप्त रूप से ऐसे प्रयोग भी प्रचलन में रहे
हे जो प्रयोग यवक्षणी साधना से सबंवधत हे तथा वजसके माध्यम से साधक को यवक्षणी साधना
में सहयोग वमलता हे. ऐसा ही प्रयोग मवणभद्र प्रसन्न प्रयोग हे वजसके माध्यम से साधक न ही
वसफय यवक्षणी साधना में सफलता प्राप्त कर सकता हे साथ ही साथ मवणभद्र देि से सबंवधत
सभी काम्य प्रयोग में भी पूणय सफलता प्राप्त करता हे. यह प्रयोग मात्र एक ही रावत्र में वसद्ध हो
सकता हे. लेवकन क्या जेन तंत्र में यवक्षणी साधना में सफलता के वलए वसफय आतना ही विधान
हे? ‘यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग’ एक ऐसा प्रयोग हे वजसके माध्यम से व्यवक्त जेन तंत्र के माध्यम
से यवक्षणी साधना में पूणय सफलता की प्रावप्त कर सकता हे. क्या हे यह प्रयोग आस पर चचाय
करेंगे ऄगले लेख में.
SOME NECESSARY FACTS REGARDING YAKSHINI SADHNA PART 3( 3)
पररणाम को प्राप्त करने के लिए हम लजस प्रकार मानलसक लिचारों का अधार बनाकर साधना शुरू करने के लिए लजस मानलसक पृष्ठभूलम का लनमााण करते है ईसे ही भाि कहा जाता है. मुख्य रूप से तंत्र में लतन भाि के बारे में ईल्िेख लमिता है. पशुभाि िीरभाि ददव्यभाि आन भािो का ऄपना ऄपना लिस्तृत ऄथा है तथा साधक कोइ भी साधना आन लतन भािो में से दकसी एक भाि से युक्त हो कर करता है. आसका सामान्य ऄथा लनकािा जाए तो पशु ऄथाात ऄबोध भाि से या लसर्ा शरीर को ध्यान में रख कर दकसी भी साधना को करना पशुभाि है. लजस साधना में साधक शौया से पररपूणा हो शलक्त को प्राप्त करने का भाि रख कर साधना करता है ईसे िीर भाि कहा जाता है. िीर भाि में साधक मात्र शरीर से ही नहीं अतंररक रूप से शलक्त के संचार के लिए कायारत हो जाता है. ददव्यभाि आन दोनों भाि से उपर है, यह भाि एकीकरण का भाि होता है तथा साधक और आष्ट में कोइ भेद नहीं रहता है. तंत्र में कॉि मागा की साधनाओ को ही ददव्य भाि से युक्त साधना कहा गया है या दर्र कइ बार कॉिमागा तथा लसद्धंताचार में ही ददव्यभाि का प्रयोग हो सकता है ऐसा लििरण लमिता है. साधक क्रमशः पहिे पशुभाि तथा िीरभाि में पूणाता प्राप्त करने पर मात्र ही ईसे ददव्यभाि की और ऄग्रसर दकया जाता है. यहााँ पर हम प्रथम दो भाि की चचाा करेंगे. जो व्यलक्त यलिणी तथा ऄप्सरा साधनाओ को शारीररक सुख से सबंध में साधना देखता है ईसकी साधना पशुभाि युक्त हो जाती है या जो व्यलक्त खुद को दारुण मानलसकता के साथ या दास हो कर साध्य को सिाश्रेष्ठ मानकर भी आस साधना को करता है िह भी पशुभाि युक्त साधना कही जाती है. यह दोनों को पशुभाि की साधना आस लिए कहा गया है क्यों की यह साधना करते िक्त साधक की मनःलस्थलत पूणा रूप से
शारीररक धराति पर ही लस्थर है. और साधक की मानलसकता लसर्ा शरीर पर ही लस्थर है. िेदकन सौंदया साधना िीर भाि की साधना है. आस लिए ऄगर साधक आसे पशुभाि के साथ सम्पप्पन करता है तो सर्िता लनलित रूप से लमि ही नहीं सकती. यही बात सदगुरुदेि भी कइ बार बता चुके है. ऄब यहााँ पर हम िीरभाि की चचाा करते है की ऄगर आस साधना को िीर भाि के साथ करना है तो आसका ऄथा क्या हुअ. यहााँ पर व्यलक्त की दो प्रकार की शलक्तयां काया करती है. शारीररक शलक्त तथा मानलसक शलक्त. हमारे शरीर तथा हमारे मनः दोनों लस्थलतयो में हमारा ध्यान मात्र हमारी साधना ही हो. और साधना को मात्र बाह्य रूप से ना देख कर अतंररक रूप से भी देखा तथा समजा जाए. कैसे? यलिणी मात्र भोग्या नहीं है. और सौंदया साधना मूितः सौंदया तत्ि की साधना है. मूि प्रकृलत की साधना है. आसके बारे में कइ बार लििेचना दी जा चुकी है. दकस प्रकार अतंररक सौंदया तथा बाह्य सौंदया का लमिाप योग्य रूप से होना ज़रुरी है. और सौंदया का ऄथा मात्र खूबसूरती नहीं है. सौंदया का अधार लसर्ा यहााँ पर शरीर नहीं है. यहााँ पर सौंदया का अधार है प्रकृलत. ऄगर साधक को सौंदया प्राप्त भी हो जाए और ईसके घर में दो समय रोटी नहीं हो तो क्या ऄथा है? साधक के अस पास की प्रकृलत में साधक को ईस सौंदया का ऄहेसास हो सके, तृलप्त का बोध हो सके. और आस साधना को पशुभाि से नहीं दकया जा सकता आसका कारण भी यही है की सौंदया साधना मात्र शरीर से सबंलधत नहीं है. ऄब यह दकस प्रकार से संभि होगा की हम मानलसक तथा शारीररक दोनों शलक्तयों को साधना में जोड़ दे ? सिाप्रथम साधक को आस बात से उपर ईठाना होगा की यह भोग्या की साधना नहीं है. साधना प्रदक्रया तो बहोत बाद की बात है. ऄगर साधक आन साधनाओ की गंभीरता को समज सकता है तो लनलित रूप से िह िीरभाि से युक्त हो कर साधना कर सकता है. साधक को कुछ अिश्यक तथ्यों से यहााँ पररलचत कराना चाहाँगा.
शारीररक रूप से अपकी साधना प्रदक्रया होती है, अपका असान, यन्त्र, मंत्रजाप, मुद्राप्रदशान अदद सभी शारीररक रूप से होता है. मानलसक रूप से सिा अिश्यक तत्ि है अपका मनोबि तथा दृढ लिश्वास. अपकी मनः लस्थलत आष्ट साध्य तक पहोचाती है और ऄगर अपका मनोबि टूट रहा है की में नहीं कर सकता या मुझसे तो ये संभि ही नहीं है तो प्रत्यिीकरण संभि नहीं है. आसके ऄिािा दृढ लिश्वास की साधना में प्रत्यिीकरण होगा ही क्यों की यह अपके मंत्रो की तीव्रता का अधार आस पर ही अधाररत है. िेदकन आन साधनाओ में तीव्रता के लिए एक और लनतांत अिश्यक तथ्य सदगुरुदेि ने बताया है. िह है क्रोधमुद्रा. क्रोध मुद्रा पौरुष का प्रदशान करती है. िेदकन आसके बारे में थोडा समजना होगा. जब हम क्रोध में हो तो मानलसक धराति से शारीररक धराति का प्रदशान होता है. ऄगर हमने मुट्ठी तन कर बैठ भी गए है िेदकन मन में तो यही है की ऐसा होता हे भी की नहीं? तो ये नहीं हो सकता. मतिब की क्रोध है ही नहीं और ना ही क्रोध मुद्रा है. क्रोध सारी शलक्त को मन में एकलत्रत कर एक ही लिचार पर केंदद्रत करने की प्रदक्रया है जहां पर दकसी भी तरह िक्ष्य मात्र ही सब कुछ हो जाता है और तब मुट्ठी बांधने की ज़रूरत नहीं है तब मुट्ठी ऄपने अप तन जाती है. आस प्रकार से यह मानलसक तथा ईसके ऄनुरूप शारीरक अचरण से युक्त होना ही साधना को िीरभाि से युक्त हो कर साधना करना है. ऄब हम िापस ऄपने कि िािे मुद्दे पर अते है. क्यों की मंडि हमें ईस प्रकार से लनमााण करना है लजससे की हमें यलिणी साधनामें सर्िता लमिे, तो ईसे िीरभाि से संचाररत करने के लिए क्या ईसका लनमााण कैसे हो. आसके लिए ज़रुरी है बीज मंत्रो का प्रयोग. हर एक बीज मंत्र की सामथ्या दकतनी हो सकती है यह कल्पना से बाहर का लिषय है िेदकन यहााँ पर में ईल्िेख करना चाहाँगा की ऄगर आस प्रकार का मंडि लिधान क्रोधबीज से युक्त हो तो िह साधक में भी िाही भाि का संचार करेगा. आस लिए आस मंडि लिधान को क्रोधबीज युक्त अकाशमंडि यन्त्र प्रदक्रया कहा जाता है.
SOME NECESSARY FACTS REGARDING YAKSHINI SADHNA PART 2( २)