IJSRST18455110 | Received : 01 April 2018 | Accepted : 25 April 2018 | March-April-2018 [(4)7 | 834-844]
© 2018 IJSRST | Volume 4 | Issue 7 | Print ISSN: 2395-6011 | Online ISSN: 2395-602X
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काव्य स्वरूप निर्णय
निवािन्द िुक्ल
नवभागाध्यक्ष सानित्य
श्री सच्चा अध्यात्म संस्कृत मिानवद्यालय
,
अरैल
,
इलािाबाद।
िोध-पत्र का प्रारूप भूनमका
(अ) प्रकृत नवषय में स्वप्रवृनि (इ) कनव
(उ) काव्य काव्यलक्षर् परम्परा
1. िब्दमात्रकाव्यवादी परम्परा
1.1. िब्दार्थोभय के काव्यत्व में नवसङ्गनत तर्था िब्द मात्र के काव्यत् व में प्रमार् 1.2. िब्दमात्र काव्यवादी आचायों के काव्यलक्षर् तर्था नवश्लेषर्
1.2.1. दण्डी 1.2.2. अनिपुरार् 1.2.3. जयदेव
1.2.4. नवश्विार्थकनवराज 1.2.5. पनण्डतराजजगन्नार्थ 1.2.6. केिवनमश्र
2. िब्दार्थोभयकाव्यवादी परम्परा
2.1. िब्दमात्र की काव्यता का निराि तर्था िब्दार्थोभय के काव्यत्व में प्रमार् 2.2. िब्दर्थोभयकाव्यवादी आचायों के काव्यलक्षर् तर्था नवश्लेषर्
2.2.1. भरतमुनि 2.2.2. भामि 2.2.3. वामि 2.2.4. आिन्दवधणि 2.2.5. राजिेखर 2.2.6. रुद्रट
2.2.7. अनभिवगुप्तपादाचायण 2.2.8. भोजराज
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भूनमका
(अ) प्रकृत नवषय में स्वप्रवृनि
भारतीय परम्परा में पुरुषार्थणचतुष्टय प्रानप्त िी मिीनषयों का लक्ष्य रिा िै। धमण अर्थण काम तर्था मोक्ष ये पुरुषार्थण चतुष्टय किलाते िैं। नजिमें प्रर्थम धमण िै तर्था धमण के अिन्तर धमण से अर्थण प्रानप्त ,धमण तर्था अर्थण से काम प्रानप्त, अन्त में धमण अर्थण तर्था काम इि तीिों पुरुषार्थण रूप साधिों से मोक्ष की प्रानप्त। नवनवध दिणिों में आचायों िे मोक्ष का नभन्न नभन्न स्वरूप प्रनतपाददत दकया िै तर्थानप सभी आचायों के मत में धमण अर्थण काम ये तीि साधि भूत िैं तर्था मोक्ष प्रानप्त िी परम प्रयोजि िै इसमें लेि मात्र सन्देि ििीं िै। नजस प्रकार मोक्ष के स्वरूप के नवषय में आचायण एकमत ििीं िै उसी प्रकार पुरुषार्थण चतुष्टय की प्रानप्त के साधि भूत उपायों के सन्दभण में भी आचायों िे नवनवध मागण प्रनतपाददत दकए िैं। नवनवध दिणिों में प्रनतपाददत मोक्षावानप्त के नवनवध उपाय दुुःसाध्य िैं तर्था इि उपायों से सुधी ऋनष मिीनषयों को िी मोक्ष्ावानप्त िै। जबदक काव्य मागण से सुखपूवणक अल्पनधयों के द्वारा भी मोक्ष प्रानप्त सम्भव िोिे से काव्य मागण रुनचर प्रतीत िोता िै।1 यि प्रानप्त, अर्थण प्रानप्त, व्यविारज्ञाि, अमङ्गल की क्षनत, नवगनलत वेद्यान्तर
आिन्दावानप्त, कान्तासनम्मतोपदेि, चतुवणगणफलप्रानप्त, कीर्तण तर्था प्रीनत रूप अिेक प्रयोजिों के साधक काव्य के स्वरूप की नजज्ञासा से प्रकृत िोध पत्र लेखि में मेरी प्रवृनि हुई।
कनव तर्था काव्य (इ) कनव
कनव िब्द की निष्पनि के सन्दभण में िमारे सम्मुख चार धातुएं िैं नजिसे कनव िब्द निष्पन्न िो सकता िै -1. कबृ वर्े (भ्वादद)
2. कु िब्दे (भ्वादद) 3. कुङ िब्दे (अदादद) 4. कुङ कूङ वा िब्दे (तुदादद)
कवते इनत कौतीनत वा इस नवग्रि में कुङ िब्दे इस धातु से अचुः इुः 'इ' प्रत्यय कर गुर् अवादेि करिे से कनव िब्द निष्पन्न िोता िै। यद्यनप यि धातु िब्दार्थणक िै तर्थानप इस धातु का नवलक्षर् वर्णि अर्थण में िी पयणवसाि िोता िै एवं वर्णि नवलक्षर् िब्दात्मक और नवलक्षर् ज्ञािात्मक िोता िै।2 अर्थाणत वर्णि नविेष में िी कनव िब्द का तात्पयण िै।
दिणि वैदुष्य िोिे पर भी वाल्मीदक दक तब तक कनव संज्ञा ििीं हुई जब तक वाल्मीदक िे वर्णिा ििीं की। ‘‘िनि कवेररनतवृिवर्णिमात्रेर्ात्मपदलाभो भवनत’’3ध्वनिकार की इस उनि से प्रतीत िोता िै दक नवलक्षर् वर्णि करिे वाला िी कनव
िोता िै। ध्वन्यालोककार आचायण आिन्दवधणि की इस उनि से दो बातें प्रतीत िोत्ी िै्ं - प्रर्थम तो यि दक वर्णि करिे वाला िी कनव किलाएगा। और दूसरी यि दक इनतवृि के वर्णि मात्र से कोई कनव ििीं किलाता; अनपतु लोक से नवलक्षर् चमत्कारकारी वर्णि करिे वाला िी कनव किलाएगा। आचायण मम्मटभट्ट भी लोकोिरवर्णिानिपुर् को कनव किते िैं।4 राजिेखर िे सहृदय कनव
की नववेचिा करते हुए किते िैं- यो हृदय एव कवते निह्िुते च स सहृदयकनवुः।5
'अकनर्थतं च' सूत्र व्याख्याि में भाष्यकार पत़ञ्जनल िे कनव िब्द का प्रयोग दकया िै - 'तदकीर्तणतमाचररतम कनविा'। इस कनव िब्द की व्याख्या में आचायण कैयट किते िैं - कनविब्दो मेधानववचिुः क्रान्तदिणिाददनत कैयटुः। (प्रदीप)। यिीं िागेिभट्ट किते िैं कनवुः क्रान्तदिणिो भवनत इनत निरुिात । क्रान्तानि दिणिानि येिेनत। उिञ्च
-जािीतो यन्न चन्द्राकौ जािन्ते यन्न योनगिुः।
1चतुवणगणफलप्रानप्तुः सुखादल्पनधयामनप।
काव्यदेव यतस्तेि तत्स्वरूपं निरूप्यते॥ (सानित्यदपणर् पृ॰03)
2रसगङ्गाधर २/२०९प० 3 ध्वन्यालोक ---।
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जािीते यन्न भगोऽनप तज्जािानत कनवुः स्वयम ॥ (उ) काव्य
कवेुः कमण इस नवग्रि से ‘‘इगन्ताच्च लघुपूवाणत 6 इस सूत्र से प्राप्त र्’ को बाधकर ब्राह्मर्ाददगर् के आकृनतगर् िोिे से ‘‘गुर्वचिब्राह्मर्ाददभ्युः कमणनर् ष्यञ 7’’ प्रत्यय से काव्य िब्द निष्पन्न हुआ िै। इस प्रकार चमत्कारर वर्णिा निपुर् कनव तर्था कनव
का कमण काव्य किलाता िै।
काव्य अर्थण नवनिष्ट िब्द रूप अर्थवा िब्दार्थोभय8 रूप िै। ऐसी दिा में अर्थण नवनिष्ट िब्द अर्थवा िब्दार्थोभय रूप काव्य
में कनव कमणता कैसे िोगी। िब्द के नित्य िोिे से कनव िब्द का निमाणर् ििीं करता िै, परन्तु अर्थण के वाचक अिेक िब्द िोिे पर भी कनव उस अर्थण नविेष के प्रनतपादि में क्षम दकसी नवलक्षर् िब्द नविेष का िी ग्रिर् करता िै। यर्था-
‘‘द्वयं गतं सम्प्रनत िोचिीयतां समागमप्रार्थणिया कपानलिुः।’’
यिााँ भगवाि िङ्कर रूप अर्थण को कपानल तर्था नपिादक दोिों िी िब्द किते िैं तर्थानप कनव िे नपिादक िब्द का प्रयोग ि कर कपानल िब्द का प्रयोग दकया िैं क्योंदक कपानल िब्द िी कपालानस्र्थ धारर्रूप अिुनच नवभत्सादद अर्थण का बोधक िोिे से िोचिीयता का उपपादि कर काव्यािुगुर् िै ि दक नपिादक िब्द। नपिाक धारर् रूप अर्थाणवगम से वीर रस का प्रत्यायक िोिे से िोचिीयता रूप उनि असङ्गत िोती। इस प्रकार कनवकमणता मुख्य रूप से अर्थण में िै तर्था अर्थाणिुकूल िब्द के चयि तर्था िब्द गुम्फि में िै।
अर्थण दो प्रकार का िोता िै- (१) स्वतुः सम्भवी (२) कनवप्रौढोनिनसद्ध। यद्यनप स्वतुः सम्भवी अर्थण लोक में ददखाई देता िै दफर भी कनव उसे यर्था तथ्य ििीं स्वीकार करता िै अनपतु अपिी प्रनतभा से उसमें अपूवणता का समावेि कर िी स्वीकार करता िै। कान्तासनम्मततयोपदेि के नलए काव्य में दोषगुर् नविनष्ट लोकप्रनसद्ध िायकादद का वर्णि ििीं करता, अनपतु दोषों को िटाकर नवलक्षर् गुर्िानलता का समावेि कर नवर्र्णत करता िै अन्यर्था प्रेक्षकों की काव्य में प्रवृनि िी ििीं िोती। अतुः काव्य के िायकादद कनवप्रनतभा प्रसूत िी िोते िैं। िानयकाओं के अङ्ग अर्थवा व्यविार जो काव्य में वर्र्णत िैं वे सभी कनवप्रनतभाप्रसूत िोिे से कनवनिर्मणत िी िैं।
कनवप्रौढोनि नसद्ध अर्थण कनव प्रनतभा प्रसूत िोिे से कनव निर्मणत िी िोता िै। इस प्रकार अर्थण की भी कनवकमणता नसद्ध िोती िै।
काव्यलक्षर् परम्परा
उस चमत्कारकारी अर्थण के उपपादि में िब्द का िी सामथ्यण िै ऐसा स्वीकार कर तर्था काव्य िब्द की योगबल के अिुरोध से कुछ आचायण9 अर्थण नविेष के प्रनतपादक िब्द को काव्य स्वीकार करते िैं, कुछ आचायण कनवसंरम्भनवषयतया अर्थण का भी प्राधान्य
अङ्गीकार कर अर्थण को िी काव्य किते िैं।10 परन्तु यि वानग्वकल्प मात्र िै। कुछ आचायण काव्य में िब्द तर्था अर्थण दोिों का प्राधान्य
प्रनतपाददत कर िब्दार्थोभय की काव्यता प्रनतपाददत करते िैं। इस प्रकार काव्य के स्वरूप प्रनतपादि में दो धारायें सम्प्रनत प्रविमाि िैं - िब्दमात्रकाव्यवादी धारा तर्था िब्दार्थोभयकाव्यवादी धारा।
1. िब्दमात्रकाव्यवादी परम्पर 1.1. िब्दार्थोभय के काव्यत्व में नवसङ्गनत तर्था िब्द मात्र के काव्यत् व में प्रमार्
* िब्दार्थणयुगल को काव्य माििे में प्रमार् का अभाव िै-
6पा०सू० ५/१/१३१ 7 पा०सू० ५/१/१२४।
8जगत के नलए काव्य पद व्यविार काव्य िब्दार्थणमय िै और यि जगत भी। अतुः इस दृश्यमाि जगत के नलए भी काव्य पद का व्यविार दकया गया िै
-िामरूपात्मकं नवश्वं यदददं दृश्यते नद्वधा। तत्राद्यस्य कनववेधा द्वतीयस्य चतुभुणजुः॥
9आचायण दण्डी पनण्डतराजजगन्नार्थादद।
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िनिग्रािक प्रमार्ों में व्यविार सबसे प्रबल प्रमार् िै। काव्यमुच्चैुः पठ्यते, काव्यादर्थोऽवगम्यते, काव्यं श्रुतम अर्थो ि ज्ञातुः इत्यादद लोक प्रचनलत व्यविारों में िब्द मात्र के नलए काव्य पद का व्यविार दकया गया िै, अर्थण के नलए काव्य पद का व्यविार ििीं हुआ िै। अतुः व्यविार प्रमार् से िब्द मात्र की िी काव्यता नसद्ध िोती िै ि दक िब्दार्थणयुगल की।
मम्मटभट्ट आदद आलङ्काररकों िे िब्दार्थणयुगल को काव्य किा िै। मम्मट भट्ट आदद पूवाणचायों द्वारा िब्दार्थणयुगल में काव्यत्व प्रनतपादि को आधार मािकर िब्द प्रमार् द्वारा िब्दार्थोभय की काव्यता अ ङ्गीकार की जाए तो यि भी उनचत ििीं क्योंदक आप्त पुरूष द्वारा प्रनतपाददत वाक्य िी िब्द प्रमार् िोता िै और नवमत विा िी अश्रद्धेय िोता िै उसका आप्तत्व िी सनन्दग्ध िै ऐसी दिा में उसके द्वारा प्रनतपाददत वाक्य िब्दप्रमार् कैसे िो सकता िै।
यदद िब्दमात्र में काव्यपद का व्यविार लाक्षनर्क मािा जाए तो इस व्यविार में मुख्यार्थणबाधादद िेतु क्ा अभाव िोिे से इसे लाक्षनर्क भी ििीं मािा जा सकता। नजस प्रकार गङ्गायां घोषुः इस उदािरर् में गङ्गानिष्ठ आधारता निरूनपत आधेयतावाि घोषुः यि मुख्यार्थण स्वीकार करिे पर प्रत्यक्ष प्रमार् के द्वारा यि मुख्यार्थण बानधत िो जाता िै क्योंदक प्रत्यक्ष प्रमार् से यि नसद्ध िै दक जलप्रवाि घोष का आधार ििीं बि सकता तब मुख्यार्थण बाध के अिन्तर जलप्रवाि रूप अर्थण की लक्षर्ा तट रूप अर्थण में की जाती िै।
नजस प्रकार जल प्रवाि घोष का आधार ििीं बि सकता यि प्रत्यक्ष प्रमार् नसद्ध िै तब गङ्गायां घोषुः इस प्रयोग में जलप्रवाि रूप अर्थण की लक्षर्ा तट रूप अर्थण में की जीती िै उसी प्रकार यदद िब्दार्थोभय का काव्यत्व दकसी दृढतर प्रमार् से नसद्ध िोता तब यदद िब्द मात्र में काव्य पद का व्यविार दकया जाता तो लक्षर्ा से िब्द से िी िब्दार्थोभय का बोध िो सकता र्था। परन्तु िब्दार्थोभय के काव्यत्व िी दकसी दृढतर प्रमार् से नसद्ध ििीं िै तो िब्द मात्र में काव्य पद के व्यविार को िम लाक्षनर्क भी ििीं माि सकते।
यदद बलात िम काव्यत्व को िब्दार्थण युगल में स्वीकार कर भी लें तो काव्यपद का प्रवृनिनिनमि11 काव्यत्व िब्दार्थणयुगल
में व्यासज्यवृनि से िै अर्थवा प्रत्येक पयाणप्त वृनि
से-व्यासज्यवृनि से काव्यत्व िब्दार्थणयुगल में रि ििीं सकता क्योंदक नजस प्रकार दो में नद्वत्व से-व्यासज्यवृनि दो में रिता िै तो एक में दो का व्यविार ििीं दकया जा सकता उसी प्रकार यदद िब्दार्थणयुगल में काव्यत्व व्यासज्यवृनि से िोगा तो श्लोक मात्र में काव्यपद का व्यविार ििीं िो पायेगा।
प्रत्येक पयाणप्त वृनि से भी काव्यत्व िब्दार्थोभय में ििीं रि सकता क्योंदक प्रत्येक पयाणप्त वृनि से काव्यत्व को िब्दार्थोभय में मािेगें तो श्लोक वाक्य काव्य तर्था अर्थण काव्य इस प्रकार एक िी काव्य में काव्यद्वय व्यविार िोिे लगेगा।
यदद आस्वादोद्वोधकत्व को काव्यत्व का प्रयोजक मािा जाए और आस्वादोद्वोधकत्व के िब्द तर्था अर्थण दोिों में समाि िोिे से िब्दार्थोभय को काव्य मािा जाए ऐसी दिा में ध्वनिकारादद समस्त आलङ्काररकों िे राग्ादद की रसव्य ञ जकता प्रनतपाददत की िै तो राग में आस्वादोद्वोधकत्व िोिे से राग को भी काव्य माििा पड़ेगा तर्था प्रायुः समस्त िाट्य ङ्गों में भी रसव्य ञ जकता िोिे से सभी में काव्यत्व की आपनि दुवाणर िोगी।
इस प्रकार िब्दार्थोभय में काव्यपद की िनि के ग्रािक प्रमार् का अभाव िोिे से तर्था िब्दार्थणयुगल के काव्यत्व प्रनतपादि में एकतर पक्षपानतिी युनि रूप नवनिगमिा के अभाव िोिे से पूवोि प्रमार् नसद्ध िब्दमात्र की िी काव्यता का अ ङ्गीकार करिे में क्या िानि िै। अतुः वेदिास्त्रपुरार् लक्षर् के समाि काव्य की भी िब्दनिष्ठता िी उनचत िै।12
1.2. िब्दमात्र काव्यवादी आचायों के काव्यलक्षर्- 1.2.1. दण्डी -
आचायण दण्डी िे काव्यादिण में इष्ट (रमर्ीय) अर्थण से युि पदावली को काव्य का िरीर किा
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‘िरीरं तावददष्टार्थणव्यवनच्छन्ना पदावली’13यद्यनप लक्षर् घटक व्यवनच्छन्न पद का अर्थण समुच्चय िोिे से इष्ट अर्थण से समुनच्चत पदावली को काव्य का िरीर प्रनतपाददत दकया गया िै तो भी यिााँ ग्रन्र्थ स्वारस्य से आचायण दण्डी का अनभप्राय इष्ट रमर्ीय अर्थण नवनिष्ट पदावली अर्थाणत िब्द मात्र काव्य िै ऐसा प्रतीत िोता िै।
1.2.2. अनिपुरार् -
आचायण दण्डी द्वारा प्रदि लक्षर् िी अनिपुरार् में भी िै। यिााँ इष्टार्थण व्यवनच्छन्न पदावली को वाक्य किा गया िै, तर्था दोषरनित, गुर् और अलङ्कार से युि वाक्य िी काव्य किलाता िै।
‘संक्षेपाद वाक्यनमष्टार्थणव्यवनच्छन्ना पदावली। काव्यं स्फुरदलङ्करं गुर्वद्दोष वर्जणतम ।।’14
1.2.3. जयदेव
-आचायण जयदेव के मत में वि वाक काव्य िै जो निदुणष्ट िो, अक्षरसंिनत आदद लक्षर्ों से युि िो, रीनत से युि िो, गुर्ों से भूनषत िो, सालङ्कार िो, सरस िो और अिेक वृनि15 वाली िो।
‘‘निदोषा लक्षर्वती सरीनतगुणर्भूषर्ा।
सालङ्काररसािेकवृनिवाणक काव्यिाम भाक ।।’’16
1.2.4. नवश्विार्थकनवराज
-आचायण मम्मट का खण्डि कर नवश्विार्थ स्वानभमत काव्य लक्षर् प्रस्तुत करते िै-
‘‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम ।’’17
आचायण रसात्मक वाक्य को काव्य किते िै्ं। यिााँ ‘रस्यते इनत रसुः’इस व्युत्पनि से रस िब्द से रस भाव, रसाभास,
भावाभास, भाविानन्त, भावोदय, भावसनन्ध, भाविबलता सभी गृिीत िोते िैं क्योंदक सभी का आस्वाद िोता िै। 1.2.5. पनण्डतराजजगन्नार्थ
-आचायण पनण्डतराजजगन्नार्थ रमर्ीय अर्थण के प्रनतपादक िब्द को काव्य किते िैं-
‘‘रमर्ीयार्थणप्रनतपादकुः िब्दुः काव्यम ’’18
अर्थाणत रमर्ीयार्थणप्रनतपादकत्वे सनत िब्दत्वम काव्यत्वम । अर्थण के प्रनतपादक व्याकरर्ादद िास्त्रगत तर्था लौदकक िब्दों में अनतव्याप्त वारर् के नलए अर्थण में रमर्ीय नविेषर् ददया गया िै। अर्थण में रमर्ीय नविेषर् िोिे से व्याकरर्ादद िास्त्रगत एवं लौदकक िब्द अर्थण के प्रनतपादक तो िैं परन्तु रमर्ीय अर्थण के प्रनतपादक ि िोिे से काव्य ििीं किलाएगें। लक्षर् में अर्थण पद के उपादाि से रमर्ीय (साधु) िब्द के प्रनतपादक व्याकरर् िास्त्र में लक्षर् की अनतव्यानप्त ििीं िोगी। रमर्ीय अर्थण के प्रनतपादक वाचक, लाक्षनर्क तर्था व्यञ्जक तीिों िब्दों का ग्रिर् करािे के नलए साधारर् प्रनतपादक िब्द का लक्षर् में उपादाि दकया गया िै। कानमिी के कटाक्षादद भी रमर्ीय अर्थण के प्रनतपादक िोते िैं, कटाक्षादद में अनतव्यानप्त वारर् के नलए लक्षर् में िब्द का ग्रिर् दकया गया िै, क्योंदक कानमिी के कटाक्षादद रमर्ीय अर्थण के प्रनतपादक तो िैं परन्तु िब्द से प्रनतपाददत ििीं िैं।
13काव्यादिण १/१०। 14अनिपुरार् ३३७/६-७।
15 उपिागररका आदद काव्य वृनि, भारती आदद िाट्यवृनि, अनभधा लक्षर्ा व्यञ्जिा आदद िब्दवृनि। 16चन्द्रालोक १/६।
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प्रनतव्यनि रुनच नभन्न िोिे के कारर् एक िी वस्तु व्यनि नविेष के नलए रमर्ीय तर्था अन्य व्यनि के नलए अरमर्ीय िोती िै। अतुः रमर्ीयता के व्यनि भेद से नभन्न नभन्न िोिे के कारर् एक िी काव्य व्यनि नविेष के नलए काव्य तर्था अन्य व्यनि के अकाव्य िोिे लगेगा।
नजस प्रकार घट अर्थण का प्रनतपादक घट आिुपूवी िोता िै, पट अर्थण का प्रनतपादक पट आिुपूवी िोता िै उसी प्रकार रमर्ीय अर्थण का प्रनतपादक 'रमर्ीय' इत्याकारक आिुपूवी िब्द िी िोगा। ऐसी दिा में यि काव्य लक्षर् रमर्ीय िब्द मात्र में घटेगा रघुवंिादद काव्य में ििीं। उि समस्या के समाधाि आचायण रमर्ीय िब्द का व्याख्याि करके किते
िैं-रमर्ीयता च लोकोिराह्लादजिकज्ञािगोचरता।19
लोकोिर अर्थाणत अलौदकक जो आह्लाद (आिन्द), उस आिन्द का जिक जो ज्ञाि, उस ज्ञाि का नवषय जो अर्थण वि रमर्ीय िै ऐसे रमर्ीय अर्थण का प्रनतपादक िब्द काव्य िै। यि लोकोिर आह्लाद आह्लादगत चमत्कार का अपर पयाणय िै,20 तर्था
इस आह्लादगत चमत्कार में कारर् िै पुिुः पुिुः अिुसन्धाि रूप भाविा।21
आचायण पनण्डतराजजगन्नार्थ यिााँ इस काव्य लक्षर् के तीि पररष्कार किते िैं-प्रर्थम पररष्कार- इत्र्थं चमत्कारजिकभाविानवषयार्थणप्रनतपादकिब्दत्वम ।
इस प्रकार चमत्कार (लोकोिराह्लाद) की जनिका जो भाविा उस भाविा का नवषय जो अर्थण उस अर्थण का प्रनतपादक िब्द काव्य िै।22
पूवण में आचायण लोकोिर आह्लाद का जिक ज्ञाि को किते िैं (रमर्ीयता च लोकोिराह्लादजिकज्ञािगोचरता), पुिुः लोकोिर आह्लाद की जनिका भाविा को किते िैं, क्योंदक ज्ञाि समूिालम्बिात्मक िोता िै और काव्य के मध्य संयोगवि ज्ञाि का नवषय बिे घटादद भी ज्ञाि के समूिालम्बिात्मक िोिे से घटादद भी काव्य किलािे लगेगें। इसनलए आचायण िे प्रर्थम पररष्कार में ज्ञाि के स्र्थाि पर लोकोिर आह्लाद का जनिका भाविा को किा िै। भाविा किे जािे से यद्यनप घटपटादद ज्ञाि का नवषय तो बिते िैं परन्तु इिकी भाविा ि िोिे के कारर् ये काव्य ििीं किलाएगें।
नद्वतीय
पररष्कार-स्र्थल नविेष में भाविा के भी समूिालम्बिात्मक िोिे से पुिुः आचायण लक्षर् पररष्कार करते िैं-यत्प्रनतपाददतार्थणनवषयक भाविात्वं चमत्कारजिकतावच्छेदकं तत्त्वम ।23
अर्थाणत नजस िब्द से प्रनतपाददत अर्थण नवषयक भाविा चमत्कार की जनिका िोगी वि िब्द काव्य िै। तृतीय
पररष्कार-नद्वतीय पररष्कार में यत पद का समावेि िै और यत पद सवणिाम िै। सवणिाम पद सभी अर्थों के वाचक िोते िैं अतुः यत तदादद सवणिाम पद अििुगमक िोते िैं। नद्वतीय पररष्कार में अििुगमक यत पद के समावेि से लक्षर् भी अििुगमक िो जाएगा जबदक लक्षर् को अिुगमक िोिा चानिए।
यद्यनप यिदादद सवणिाम िब्दों की भी िनि अर्थण नविेष में िोती िै- यिदोुः बुद्धनवषयतावच्छेदकत्वेिोपलनक्षततिद्धमाणवनच्छन्ने िनिुः। परन्तु यिााँ बुनद्धस्र्थ नवषय के अभाव में यत पद की अर्थण नविेष में िनि का निधाणरर् सम्भव ििीं िै। इसनलए पनण्डतराज तृतीय पररष्कार करते
िैं-स्वनवनिष्टजिकतावच्छेदकार्थणप्रनतपादकतासंसगेर् चमत्कारत्ववत्त्वमेव वा काव्यत्वम 24
19रसगङ्गाधर प्रर्थम आिि पृ॰ 11
20लोकोिरत्वं चाह्लादगतश्चमत्कारत्वापरपयाणयोऽिुभवसानक्षको जानतनविेषुः (रसगङ्गाधर प्रर्थम आिि पृ॰ 11) 21कारर्ं च तदवच्छन्ने भाविानविेषुः पुिुः पुिरिुसन्धािात्मा (रसगङ्गाधर प्रर्थम आिि पृ॰12)
22इत्र्थं चमकत्कारजिकभाविानवयार्थणप्रनतपादक-िब्दत्वम । 23रसगङ्गाधर प्रर्थम आिि पृ॰ 13
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तृतीय पररष्कार में 'चमत्कारत्ववत्त्वमेव वा काव्यत्वम ' मात्र काव्य लक्षर् िै, िेष
'स्वनवनिष्टजिकतावच्छेदकार्थणप्रनतपादकतासंसगेर्' यि सम्बन्ध मात्र िै। 'चमत्कारत्ववत्त्वमेव वा काव्यत्वम ' इस लक्षर् में चमत्कार िब्द से त्व प्रत्यय पुिुः मतुप प्रत्यय हुआ िै, पुिुः मतुबन्त से भाव में त्व प्रत्यय25 नवनित िै। वाक्यपदीयकार के 'कृिनद्धतसमासेभ्युः
सम्बन्धानभधािं भावप्रत्ययेि' इस नियम से तनद्धतान्त से नवनित भाव प्रत्यय का सम्बन्धमात्र अर्थण िोता िै।
इस प्रकार चमत्कारत्वनवनिष्टुः िब्दुः काव्यम यि काव्य लक्षर् िोगा। अब यिााँ नवचारर्ीय िै दक चमत्कारत्व नवनिष्ट तो चमत्कार िोगा चमत्कारत्व नवनिष्ट िब्द कैसे? यिााँ स्वनवनिष्टजिकतावच्छेदकार्थणप्रनतपादकतासंसगण से चमत्कारत्व को िम िब्द में ले जाएगें। स्व अर्थाणत चमत्कारत्व और चमत्कारत्वनवनिष्टा जिकता, पुिुः नवचारर्ीय िै दक चमत्कारत्व नवनिष्ट तो चमत्कार िोगा चमत्कारत्वनवनिष्टा जिकता कैसे। अब यिााँ पुिुः स्वाश्रयनिष्ठजन्यतानिरूनपतजिकता सम्बन्ध से स्व अर्थाणत चमत्कारत्व और चमत्कारत्व का आश्रय चमत्कार, चमत्कार में रििे वाली जन्यता से निरूनपत जिकता भाविा में िोगी। इस भाविा का अवच्छेदक जो अर्थण उस अर्थण का प्रनतपादक िब्द काव्य िै इस प्रकार लक्षर् सङ्गनत िोती िै।
अवच्छेद्य तर्था अवच्छेदक का सामािानधकरण्य नियम किा गया िै। यिााँ अवच्छेद्या िै जिकता तर्था अवच्छेदक िै अर्थण ये दोिों िी भाविा में रिते िै। जिकता स्वरूप सम्बन्ध से तर्था अर्थण नवषनयता सम्बन्ध से भाविा में रिते िैं इस प्रकार अवच्छेद्या जिकता तर्था अवच्छेदक अर्थण दोिों का आश्रय भाविा के िोिें से अवच्छेद्य तर्था अवच्छेदक दोिों का सामािानधकरण्य नसद्ध िोता िै।
यद्यनप तृतीय पररष्कार में भी स्व पद सवणिाम पद िै जो दक अििुगमक िै तो भी यिााँ यि स्व पद लक्षर् घटक ििीं अनपतु सम्बन्धघटक िै।
इस प्रकार - "समवायसम्बन्धावनच्छन्नचमत्कारत्वावनच्छन्नचमत्कारनिष्ठजिकतानिरूनपता या समवायसम्बन्धावनच्छन्ना भाविात्वावनच्छन्ना भाविानिष्ठाजिकता, तनन्नष्ठा या स्वरूपसम्बन्धावनच्छन्नाऽवच्छेद्यता, तनन्नरूनपता नवषयतासम्बन्धाऽनच्छन्नाऽवच्छेदकताश्रयो योऽर्थणस्तनद्वषयकप्रनतपनिजिकत्वे सनत िब्दत्वं काव्यत्वनमनत निष्कृष्टं लक्षर्म "26
1.2.6. केिवनमश्र
-केिवनमश्र िे आचायण नवश्विार्थ का अिुसरर् दकया िै, उन्िोिें िौद्धोदनि के अिुसार काव्यलक्षर् प्रस्तुत दकया िै- ‘‘वाक्यं रसाददमत काव्यं श्रुतं सुखनविेषकृत ।’’27 रसाददमत पद में आदद पद से अन्िोिें अलङ्कार को भी गृिीत दकया िै।
2. िब्दार्थोभयकाव्यवादी परम्परा 2.1 िब्दार्थोभय के काव्यत्व में प्रमार्
िब्दार्थोभय के काव्यत्व में आपनियों का क्रमिुः निराकरर्
-नजस प्रकार िब्द मात्र के काव्यत्व में आपके मत में व्यविार का प्रामाण्य बतलाया गया िै उसी प्रकार िब्दार्थोभय के काव्यत्व में भी व्यविार के प्रामाण्य को स्वीकार करिा चानिए। नजस प्रकार ‘काव्यं श्रुतम ’यि व्यविार िोता िै उसी प्रकार ‘काव्यं बुद्धम ’यि व्यविार भी िोता िै। अर्थाणत श्रवर्ेनन्द्रय के नवषय िब्द के नलए नजस प्रकार काव्य पद का प्रयोग ‘काव्यं श्रुतम ’इस व्यविार में दकया जाता िै उसी प्रकार ज्ञाि के नवषय अर्थण के नलए भी ‘काव्यं बुद्धम ’इस प्रकार का व्यविार दकया जाता िै। काव्य िब्द को पढकर नबिा अर्थणज्ञाि के ‘काव्यं बुद्धम ’यि व्यविार कोई ििीं करता।
25भावस्त्वतलौ
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काव्य पद का प्रवृनि निनमि काव्यत्व व्यासज्य वृनि से िब्दार्थोभय में रिता िै, परन्तु केवल श्लोक वाक्य में काव्य पद व्यविार ‘‘समुदाये प्रवृिुः िब्दोऽवयवेष्वनप वतणते।’’28 इस नसद्धान्त से अर्थवा अवयवावयनवभाव सम्बन्धमूलक लक्षर्ा से प्रयुि िै।
वेद पुरार् भी िब्द मात्र ििीं िैं अनपतु िब्दार र्थोभय रूप िी िैं। जैसा दक ‘‘तदधीते तद्वेद’’29 सूत्र के भाष्य में मिाभाष्यकार
िङ्क्ा कर समाधाि देते िैं दक अनध पूवणक इक धातु तर्था नवद धातु दोिों िी ज्ञािार्थणक िैं तो दोिो का सूत्र में पृर्थक निदेि क्यों?
इसका समाधाि करते हुए भाष्यकार किते िैं दक यिााँ अनध पूवणक इक धातु संिि अर्थण में िै। संिि का अर्थण िै उच्चारर् पूवणक उच्चारर् िै, अर्थाणत गुरु उच्चारर् करता िै तर्था निष्य उस उच्चारर् को सुि कर वैसा िी उच्चारर् करता िै। यि संिि करिे वाला वैददक िै। इसप्रकार उच्चारर् िब्द का िोता िै अतुः यिााँ वेद की िब्दरूपता नसद्ध िोती िै। सूत्र में नवद धातु ज्ञािार्थणक िै एवं ज्ञाि से यिााँ अर्थण ज्ञाि अपेनक्षत िै। अर्थाणत जो वेदार्थण को जािता िै वि भी वैददक िै। इस प्रकार वेद की अर्थणरूपता भी नसद्ध िोती िै। इसनलए अनध पूवणक इक धातु तर्था नवद धातु दोिों का ग्रिर् दकया गया िै। इस प्रकार वेद के मुख्य अङ्गभूत व्याकरर् से िब्दार्थोभय का वेदत्व प्रनतपाददत दकया गया िै।
इस प्रकार काव्यात्मभूत रस अर्थवा ध्वनि का व्यञ्जक नजस प्रकार िब्द िै उसी प्रकार अर्थण भी िै। एवं ध्वनिकार आिन्दवधणि भी ध्वनि के उपपादि में िब्द तर्था अर्थण दोिों का प्राधान्य प्रनतपादि करते
िैं-यत्रार्थणुः िब्दो वा तमर्थणमुपसजणिकृतस्वार्थौ।
व्यङ्िुः काव्यनविेषुः स ध्वनिररनत सूररनभुः कनर्थतुः।।
प्रकृत काररका में वा िब्द प्राधान्यार्थणक तर्था समुच्चयार्थणक
िै-‘‘वा नवकल्पेऽर्थ प्राधान्ये सादृश्येऽर्थ समुच्चये’’30
अर्थाणत व्यङ्ग्य अर्थण के प्रनतपादि में िाब्दी व्यञ्जिा में िब्द का प्राधान्य तर्था अर्थण की सिकाररता31 एवं आर्थी व्यञ्जिा में
अर्थण का प्राधान्य तर्था िब्द की सिकाररता।32 अतुः िब्द एवं अर्थण दोिों िी प्रधाि िोते िैं। इसी को सानित्य (सिभाव) किते िैं।
अतुः िब्दार्थोभय काव्य िैं यिी युनियुि प्रतीत िोता िै।
2.2. िब्दर्थोभयकाव्यवादी आचायों के काव्यलक्षर् तर्था नवश्लेषर् -2.2.1. भरतमुनि
आचायण भरतमुनि िाट्यिास्त्र में काव्य स्वरूप का प्रनतपादि यद्यनप ििीं करते िैं तो भी प्रसङ्गतुः आचायण िे काव्य क्ी सात नविेषताएाँ किीं िैं, नजसमें िब्दार्थण युगल की िी काव्यता नसद्ध िोत्ी
िै-‘‘मृदुलनलत पदाढ्यं गूढिब्दार्थण िीिं,
बहुजिसुखबोध्यं युनिमन्नृत्ययोज्यम । बहुकृत रसमागं सनन्धसन्धाियुिं स भवनत िुभकाव्यं िाटकप्रेक्षकार्ाम ॥’’33
मृदुलनलतपदावली, गूढिब्दार्थणिीिता, सवणसुगमता, यनिमिा, िृत्योपयोगयोग्यता, बहुकृतरसमागणता एवं सनन्धयुिता ये काव्य की सात नविेषताएं आचायण िे किीं िैं इिमें िृत्योपयोगयोग्यता एवं सनन्धयुिता िाट्यमात्र के नलए िैं नविेषताएं दृश्यश्रव्य उभयसाधारर् िैं। इिमें से गूढिब्दार्थणिीिता कदानचत िब्दार्थोभयकाव्यवादी धारा को पुष्ट करती िै।
2.2.2. भामि
28 म०भा०प० 29 पा०सू० ४/२/५९) 30 इनत कोिात ।
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आचायण भामि िब्दार्थण के सिभाव को काव्य किते
िैं-"िब्दार्थौ सनितौ काव्यम "34
यद्यनप भामि प्रनतपाददत काव्यलक्षर् में दोषभाव गुर् तर्था अलङ्कार का समावेि ििीं िै तो भी सम्पूर्ण ग्रन्र्थ स्वारस्य से दोषरनित गुर्ालङ्कारनवनिष्ट िब्दार्थण का सिभाव काव्य िै यि काव्यलक्षर् फनलत िोता िै।
आचायण भामि काव्य में दोष का सवणर्था अभाव प्रनतपाददत करते िैं। दुष्टपुत्र के समाि दोष युि काव्य कनव की निन्दा का कारर् बिता
िै।-"सवणर्था पदमप्येकं ि निगद्यमवद्यवत ।
नवलक्ष्मर्ा नि काव्येि दुस्सुतेिेव निन्द्यते॥"{काव्यालङ्कार पृ॰ 4}
पुिुः आचायण दोषाभाव की अनिवायणता को प्रनतपाददत करते हुए कुकनवत्व को कनव का साक्षात मरर् िी नलखते
िैं-"िाकनवत्वमधमाणय व्याधये दण्डिाय वा।
कुकनवत्वं पुिुः साक्षान्मृनतमाहुमणिीनषर्ुः॥"{काव्यालङ्कार पृ॰ 4}
इस प्रकार आचायण भामि दोषरनित िब्दार्थण के सिभाव को काव्य प्रनतपाददत करते िैं।
आचायण ‘िब्दानभधेयालङ्कारभेदाददष्ट द्वयं तु िुः’35 इस काररका द्वारा काव्य में चमत्काराधायक तत्त्व अलङ्कार को मािा
िै, वि िब्दालङ्कार तर्था अर्थाणलङ्कार भेद से दो प्रकार का िै, दोिों को स्वीकार दकया िै। इिका अलङ्कार और अलङ्कृनत िब्द व्यापक िै, अपिे दोषाभाव गुर् तर्था रस को समानित दकए हुए िै। ये रस को भी रसवदलङ्कार िी किते िैं।
2.2.3. वामि
वामि िे काव्य की उपादेयता अलङ्कारों से मािी िै। काव्य में सौन्दयण का आधाि दोषों के अभाव से तर्था गुर्ों और अलङ्कारों के ग्रिर् से िोता िै। गुर्ों और अलङ्कारों में इन्िोिें गुर्ों को काव्य का नित्य धमण मािा िै, अलङ्कारों को अनित्य।36
काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात ।’ काव्यिब्दोऽयं गुर्ालङ्कारसंस्कृतयोुः िब्दार्थणयोवणतणते। भि या तु िब्दार्थणमात्रवचिोऽत्र गृह्यते। सौन्दयणमलङ्कारुः। स दोषगुर्ालङ्कारिािादािाभ्याम ।।37
2.2.4. आिन्दवधणि
आचायण का मुख्य प्रनतपाद्य नवषय काव्यात्मा ध्वनि िै तो भी प्रसङ्गवि अभाववाद का मत निरूपर् करते हुए इन्िोिें काव्य का लक्षर् भी किा िै ‘काव्य का िब्द और अर्थण िरीर िै, िब्द में चारुता के िेतु िब्दालङ्कार िैं, अर्थण में चारुता लािे वाले अर्थाणलङ्कार िैं सङ्घटिा के धमण गुर् िैं। रीनत और वृनि इन्िीं में समानित िैं (िब्दार्थणिरीरं तावत काव्यम .... प्रर्थम अभाववाद।’
प्रनसद्ध प्रस्र्थाि से भी यिी अभीष्ट िै ‘‘तौ िब्दार्थौ मिाकवेुः’’38, ‘व्यङ्ग्यव्यञ्जकाभ्यामेवसुप्रयुिाभ्याम ’39
2.2.5. राजिेखर
राजिेखर िे काव्यपुरुषोत्पनि प्रकरर् में सरस्वती के मुख से काव्य का स्वरूप वर्णि कराया िै। िब्द और अर्थण तुम्िारे िरीर िैं। तुम सम, प्रसन्न, मधुर, उदार एवं ओजस्वी िो (ये गुर् िैं)। अिुप्रास उपमादद तुम्िें अलङ्कृत करते िैं। रस तुम्िारी आत्मा िै। िब्दार्थौ ते िरीरम ... समप्रसन्नो मधुर-उदार-ओजस्वी चानस। रस आत्मा .... अिुप्रासोपमादयश्च त्वामलङ्कुवणनन्त।’40
34 काव्यालङ्कार १/६। 35 का०लं० १/१५।
36 पूवे नित्याुः (काव्यालङ्कार सूत्र वृनि ३/१/३)। 37 काव्यालङ्कार सूत्रवृनि १-२।
38 ध्वन्या०१/८। 39 विी वृनि।
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2.2.6. रुद्रट
आचायण रुद्रट िे ‘ििु िब्दार्थौ काव्यम ’41 किकर भामि का अिुसरर् दकया िै।
2.2.7. अनभिवगुप्तपादाचायण
अनभिवगुप्तपादाचायण िे काव्यलक्षर् के नवषय में आिन्दवधणि का मत स्वीकार दकया िै-
‘लोकिास्त्रानतररिसुन्दरिब्दार्थोभयस्य काव्यस्य’।42
2.2.8. भोजराज
आचायण भोजराज िे भी दोषरनित गुर्नवनिष्ट, अलङ्कारों से अलङ्कृत, रसानन्वत को काव्य किा िै-
‘निदोषं गुर्वत काव्यमलङ्कारैरलङ्कृतम ।’
रसानन्वतं कनवुः कुवणि ...।।43
इस पर रत्नदपणर् टीका में रत्नेश्वर िे स्पष ट किा िै- ‘यद्यनप काव्यिब्दो दोषाभावाददनवनिष्टावेव िब्दार्थौ ब्रूते तर्थानप लक्षर्या िब्दमात्रे प्रयुिुः’44
2.2.9. कुन्तक
आचायण कुन्तक के मत में िब्द और अर्थण दोिों में चमत्काराधाि की क्षमता िोती िै अतुः िब्द और अर्थण दोिों का सिभाव काव्य िै।
सिभाव अर्थवा सानित्य - कनव के नववनक्षत अर्थण का एक मात्र वाचक िब्द िो और सहृदयों को आिनन्दत करिे वाला स्वभावतुः सुन्दर अर्थण इि दोिों का परस्पर स्पधाणनधरूढ िोिा सानित्य िै।
िब्द तर्था अर्थण दोिों का अलङ्कार वक्रोनि िै। अतुः ‘वक्रता नवनिष्ट कनव व्यापार से िोनभत िोिे वाले बन्ध (वाक्य नवन्यास) में व्यवनस्र्थत िब्दार्थण युगल का सिभाव काव्य िै जो सहृदयों को आिनन्दत करता िै।’
‘‘िब्दार्थौ सनितौ वक्रकनवव्यापारिानलनि। बन्धे व्यवनस्र्थतौ काव्यं तनद्वदाह्लादकाररनर्।।’’45
2.2.10. मम्मट
आचायण मम्मट िे अपिे ग्रन्र्थ काव्यप्रकाि में चमत्कार के जिक अर्थण नविेष से सम्बद्ध िब्द तर्था िब्द नविेष से प्रनतपाददत अर्थण दोिों को काव्य प्रनतपाददत दकया िै
-‘तददोषौ िब्दार्थौ सगुर्ाविलङ्कृती पुिुः क्वानप’।46
प्रकृत लक्षर् में लक्ष्य तत 47 पद बोध्य 'काव्यम ' िै, तर्था लक्षर् 'िब्दार्थौ' िै। लक्षर्भूत िब्दार्थौ पद के तीव नविेषर् िैं -
अदोषौ, सगुर्ौ, अिलङ्कृती पुिुः क्वानप। इस प्रकार दोष रनित, गुर् नवनिष्ट एवं सवणत्र स्फुट अलङ्कार से युि तर्था किीं अस्फुट अलङ्कार से युि िोिे पर भी िब्दार्थण काव्य िैं।
41 काव्यालङ्कार २/१। 42 लोचि पृ० १५। 43 सरस्वती कण्ठाभरर् १/२। 44 सर०क० पृ० ३। 45 वक्रानि १/७।
46काव्यप्रकाि प्रर्थम उल्लास।
47 'तत ' पद सवणिाम िै, यत तत आदद सवणिाम पदों की िनि "यत -तदोुः बुनद्धनवषयतावच्छेदकत्वेिोपलनक्षत तिद्धमाणवनच्छन्ने िनिुः" में िोती िै। अर्थाणत सवणिाम पद पूवण के
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िब्दार्थौ यिााँ अर्थण का आश्रय िोिे से तर्था अर्थण के भी िब्दप्रनतपाद्य िोिे से िब्द को पिले किा गया िै। इसीनलए 'िामरूप व्याकरवानर्' इत्यादद वैददक प्रयोगों तर्था 'वागर्थाणनवव सम्प्रृिौ'48 इत्यादद लौदकक प्रयोगों में िब्द का प्रार्थम्य िै।
2.2.11. िेमचन्द्र
आचायण िेमचन्द्र िे मम्मट का िी अिुसरर् दकया िै, वे दोषरनित गुर् युि, अलङ्कार युि िब्दार्थण युगल को काव्य मािा िै। प्रायुः परवती आचायों िे मम्मट का िी अिुसरर् दकया िै।
‘‘अदोषौ सगुर्ौ सालङ्कारौ च िब्दार्थौ काव्यम ।’’49
2.2.12. वाग्भट
वाग्भट िे उस साधु (निदोष) िब्द और अर्थण के सन्दभण को काव्य मािा िै, जो गुर्ालङ्कार से भ्ूनषत िो और रीनत तर्था स्फुट रस से युि िो।
‘‘साधुिब्दार्थणसन्दभण गुर्ालङ्कारभूनषतम । स्फुटरीनतरसोपेतं काव्यम ...।।’’50
2.2.13. गोनवन्दठक्कुर
आचायण ठक्कुर िे मम्मटानभत काव्य लक्षर् घटक अिलङ्कृती पद की व्याख्या करते हुए स्वीकार दकया िै ‘चमत्कारसारं काव्यम ’चमत्कार का सार काव्य िै और चमत्कार का जिक रसादद और अलङ्कार िैं। नजस काव्य में रसादद िैं विााँ रस से िी चमत्कार िो जाएगा विााँ स्फुट अलङ्कार की अपेक्षा ििीं िै परन्तु िीरस में यदद स्फुट अलङ्कार ििीं िोगा तो चमत्कार किााँ से आएगा। ‘रसाददरलङ्कारश्च द्वयं चमत्कारिेतुुः ...िीरसे तु यदद ि स्फुटोऽलङ्कारुः स्यात तत ककं कृतश्चमत्कारुः।51
2.2.14. समुद्रबन्ध
समुद्रबन्ध िे अलङ्कार सवणस्व की टीका में नवनिष्ट िब्दार्थण को काव्य मािा िै। ‘‘इि नवनिष्टौ िब्दार्थौ तावत काव्यम ।। 2.2.15. नवद्यािार्थ
आचायण नवद्यािार्थ िे दोष वर्जणत गुर्ालङ्कार सनित िब्दार्थण युगल को काव्य किा िै। ‘‘गुर्ालङ्कारसनितौ िब्दार्थौ दोषवर्जणतौ।’’52
2.2.16. नवद्याधर
आचायण नवद्याधर िे िब्द और अर्थण को काव्य का िरीर मािा िै और ध्वनि को आत्मा किा िै। ‘‘िब्दार्थौ वपुरस्य तत्र नवबुधैरात्माभ्यधानय ध्वनिुः’’53