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Shabar Mantra

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Academic year: 2021

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(1)

A collection of very powerful Shabar Mantras

सबा भोहन

सबा भोहन “गॊगा किनाय िी ऩीरी-ऩीरी भाटी। चन्दन िे रुऩ भें बफिे हाटी-हाटी।। तुझे गॊगा िी िसभ, तुझे िाभाऺा िी दोहाई। भान रे सत-गुरु िी फात, ददखा दे ियाभात। खीॊच जादू िा िभान, चरा दे भोहन फान। भोहे जन-जन िे प्राण, तुझे गॊगा िी आन। ॐ नभ् िाभाऺाम अॊ िॊ चॊ टॊ तॊ ऩॊ मॊ शॊ ह्ीॊ क्ीॊ श्ीॊ पट् स्वाहा।।” विधध्- जजस ददन सबा को भोदहत कयना हो, उस ददन उषा-कार भें ननत्म कभों से ननिृत्त होकय „गॊगोट‟ (गॊगा की मभट्टी) का चन्दन गॊगाजर भें नघस रे औय उसे १०८ फाय उक्त भन्र से अमबभजन्रत कये। फपय श्री काभाऺा देिी का ध्मान कय उस चन्दन को रराट (भस्तक) भें रगा कय सबा भें जाए, तो सबा के सबी रोग जऩ-कत्ताा की फातों ऩय भुग्ध हो जाएॉगे।

शत्रु-भोहन

“चन्र-शत्रु याहू ऩय, ववष्णु िा चरे चक्। बागे बमबीत शत्रु, देखे जफ चन्र वक्। दोहाई िाभाऺा देवी िी, पूॉि-पूॉि भोहन-भन्त्र। भोह-भोह-शत्रु भोह, सत्म तन्त्र-भन्त्र-मन्त्र।। तुझे शॊिय िी आन, सत-गुरु िा िहना भान। ॐ नभ् िाभाऺाम अॊ िॊ चॊ टॊ तॊ ऩॊ मॊ शॊ ह्ीॊ क्ीॊ श्ीॊ पट् स्वाहा।।” विधध्- चन्र-ग्रहण मा सूमा-ग्रहण के सभम फकसी फायहों भास फहने िारी नदी के फकनाये, कभय तक जर भें ऩूिा की ओय भुख कयके खडा हो जाए। जफ तक ग्रहण रगा यहे, श्री काभाऺा देिी का ध्मान कयते हुए उक्त भन्र का ऩाठ कयता यहे। ग्रहण भोऺ होने ऩय सात डुफफकमाॉ रगाकय स्नान कये। आठिीॊ डुफकी रगाकय नदी के जर के बीतय की मभट्टी फाहय ननकारे। उस मभट्टी को अऩने ऩास सुयक्षऺत यखे। जफ फकसी शरु को सम्भोदहत कयना हो, तफ स्नानादद कयके उक्त भन्र को १०८ फाय ऩढ़कय उसी मभट्टी का चन्दन रराट ऩय रगाए औय शरु के ऩास जाए। शरु इस प्रकाय सम्भोदहत हो जामेगा फक शरुता छोडकय उसी ददन से उसका सच्चा मभर फन जाएगा।

ऩीलरमा िा भॊत्र

ऩीलरमा िा भॊत्र “ओभ नभो फैतार। ऩीमरमा को मभटािे, काटे झाये। यहै न नेंक। यहै कहूॊ तो डारॊ छेद-छेद काटे। आन गुर गोयख-नाथ। हन हन, हन हन, ऩच ऩच, पट् स्िाहा।” विधध्- उक्त भन्र को „सूमा-ग्रहण‟ के सभम १०८ फाय जऩ कय मसद्ध कयें। फपय शुक्र मा शननिाय को काॉसे

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की कटोयी भें एक छटाॉक नतर का तेर बयकय, उस कटोयी को योगी के मसय ऩय यखें औय कुएॉ की „दूफ‟ से तेर को भन्र ऩढ़ते हुए तफ तक चराते यहें, जफ तक तेर ऩीरा न ऩड जाए। ऐसा २ मा ३ फाय कयने से ऩीमरमा योग सदा के मरए चरा जाता है।

दाद िा भन्त्र

दाद िा भन्त्र “ओभ ् गुरभ्मो नभ्। देि-देि। ऩूया ददशा बेरनाथ-दर। ऺभा बयो, विशाहयो िैय, बफन आऻा। याजा फासुकी की आन, हाथ िेग चराि।” विधध्- फकसी ऩिाकार भें एक हजाय फाय जऩ कय मसद्ध कय रें। फपय २१ फाय ऩानी को अमबभजन्रत कय योगी को वऩरािें, तो दाद योग जाता है।

आॉख िी पूरी िाटने िा भन्त्र

आॉख िी पूरी िाटने िा भन्त्र “उत्तय कार, कार। सुन जोगी का फाऩ। इस्भाइर जोगी की दो फेटी-एक भाथे चूहा, एक काते पूरा। दूहाई रोना चभायी की। एक शब्द साॉचा, वऩण्ड काॉचा, पुयो भन्र-ईश्ियो िाचा” विधध्- ऩिाकार भें एक हजाय फाय जऩ कय मसद्धकय रें। फपय भन्र को २१ फाय ऩढ़ते हुए रोहे की कीर को धयती भें गाडें, तो „पूरी‟ कटने रगती है।

नजय उतायने िे उऩाम

नजय उतायने िे उऩाम १॰ फच्चे ने दूध ऩीना मा खाना छोड ददमा हो, तो योटी मा दूध को फच्चे ऩय से „आठ‟ फाय उताय के कुत्ते मा गाम को खखरा दें। २॰ नभक, याई के दाने, ऩीरी सयसों, मभचा, ऩुयानी झाडू का एक टुकडा रेकय „नजय‟ रगे व्मजक्त ऩय से „आठ‟ फाय उताय कय अजग्न भें जरा दें। „नजय‟ रगी होगी, तो मभचों की धाॊस नहीीँ आमेगी। ३॰ जजस व्मजक्त ऩय शॊका हो, उसे फुराकय „नजय‟ रगे व्मजक्त ऩय उससे हाथ फपयिाने से राब होता है। ४॰ ऩजश्चभी देशों भें नजय रगने की आशॊका के चरते „टच वुड‟ कहकय रकडी के पनीचय को छू रेता है। ऐसी भान्मता है फक उसे नजय नहीॊ रगेगी। ५॰ धगयजाघय से ऩविर-जर राकय वऩराने का बी चरन है।

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६॰ इस्राभ धभा के अनुसाय „नजय‟ िारे ऩय से „अण्डा‟ मा „जानवय िी िरेजी‟ उताय के „फीच चौयाहे‟ ऩय यख दें। दयगाह मा कब्र से पूर औय अगय-फत्ती की याख राकय „नजय‟ िारे के मसयहाने यख दें मा खखरा दें। ७॰ एक रोटे भें ऩानी रेकय उसभें नभक, खडी रार मभचा डारकय आठ फाय उताये। फपय थारी भें दो आकृनतमाॉ- एक काजर से, दूसयी कुभकुभ से फनाए। रोटे का ऩानी थारी भें डार दें। एक रम्फी कारी मा रार यङ्ग की बफन्दी रेकय उसे तेर भें मबगोकय „नजय‟ िारे ऩय उताय कय उसका एक कोना धचभटे मा सॉडसी से ऩकड कय नीचे से जरा दें। उसे थारी के फीचो-फीच ऊऩय यखें। गयभ-गयभ कारा तेर ऩानी िारी थारी भें धगयेगा। मदद नजय रगी होगी तो, छन-छन आिाज आएगी, अन्मथा नहीॊ। ८॰ एक नीॊफू रेकय आठ फाय उताय कय काट कय पेंक दें। ९॰ चाकू से जभीन ऩे एक आकृनत फनाए। फपय चाकू से „नजय‟ िारे व्मजक्त ऩय से एक-एक कय आठ फाय उतायता जाए औय आठों फाय जभीन ऩय फनी आकृनत को काटता जाए। १०॰ गो-भूर ऩानी भें मभराकय थोडा-थोडा वऩराए औय उसके आस-ऩास ऩानी भें मभराकय नछडक दें। मदद स्नान कयना हो तो थोडा स्नान के ऩानी भें बी डार दें। ११॰ थोडी सी याई, नभक, आटा मा चोकय औय ३, ५ मा ७ रार सूखी मभचा रेकय, जजसे „नजय‟ रगी हो, उसके मसय ऩय सात फाय घुभाकय आग भें डार दें। „नजय‟-दोष होने ऩय मभचा जरने की गन्ध नहीॊ आती। १२॰ ऩुयाने कऩडे की सात धचजन्दमाॉ रेकय, मसय ऩय सात फाय घुभाकय आग भें जराने से „नजय‟ उतय जाती है। १३॰ झाडू को चूल्हे / गैस की आग भें जरा कय, चूल्हे / गैस की तयप ऩीठ कय के, फच्चे की भाता इस जरती झाडू को 7 फाय इस तयह स्ऩशा कयाए फक आग की तऩन फच्चे को न रगे। तत्ऩश्चात ् झाडू को अऩनी टागों के फीच से ननकार कय फगैय देखे ही, चूल्हे की तयप पेंक दें। कुछ सभम तक झाडू को िहीॊ ऩडी यहने दें। फच्चे को रगी नजय दूय हो जामेगी। १४॰ नभक की डरी, कारा कोमरा, डॊडी िारी 7 रार मभचा, याई के दाने तथा फपटकयी की डरी को फच्चे मा फडे ऩय से 7 फाय उफाय कय, आग भें डारने से सफकी नजय दूय हो जाती है। १५॰ फपटकयी की डरी को, 7 फाय फच्चे/फडे/ऩशु ऩय से 7 फाय उफाय कय आग भें डारने से नजय तो दूय होती ही है, नजय रगाने िारे की धुॊधरी-सी शक्र बी फपटकयी की डरी ऩय आ जाती है। १६॰ तेर की फत्ती जरा कय, फच्चे/फडे/ऩशु ऩय से 7 फाय उफाय कय दोहाई फोरते हुए दीिाय ऩय धचऩका दें। मदद नजय रगी होगी तो तेर की फत्ती बबक-बबक कय जरेगी। नजय न रगी होने ऩय शाॊत हो कय जरेगी। १७॰ “नभो सत्म आदेश। गुरु िा ओभ नभो नजय, जहाॉ ऩय-ऩीय न जानी। फोरे छर सो अभृत-फानी। िहे नजय िहाॉ से आई ? महाॉ िी ठोय तादह िौन फताई ? िौन जातत तेयी ? िहाॉ ठाभ ? किसिी फेटी ? िहा तेया नाभ ? िहाॊ से उडी, िहाॊ िो जाई ? अफ ही फस िय रे, तेयी भामा तेयी जाए। सुना चचत राए, जैसी होम सुनाऊॉ आम। तेलरन-तभोलरन, चूडी-चभायी, िामस्थनी, खत-यानी, िुम्हायी, भहतयानी, याजा िी यानी। जािो दोष, ताही िे लसय ऩडे। जाहय ऩीय नजय िी यऺा िये। भेयी बक्तत, गुरु िी शक्तत। पुयो भन्त्र, ईश्वयी

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वाचा।” विधध- भन्र ऩढ़ते हुए भोय-ऩॊख से व्मजक्त को मसय से ऩैय तक झाड दें। १८॰ “वन गुरु इद्मास िरु। सात सभुर सुखे जाती। चाि फाॉधूॉ, चािोरी फाॉधूॉ, दृष्ट फाॉधूॉ। नाभ फाॉधूॉ तय फार बफयाभनाची आतनङ्गा।” विधध- ऩहरे भन्र को सूमा-ग्रहण मा चन्र-ग्रहण भें मसद्ध कयें। फपय प्रमोग हेतु उक्त भन्र के मन्र को ऩीऩर के ऩत्ते ऩय फकसी करभ से मरखें। “देवदत्त” के स्थान ऩय नजय रगे हुए व्मजक्त का नाभ मरखें। मन्र को हाथ भें रेकय उक्त भन्र ११ फाय जऩे। अगय-फत्ती का धुिाॉ कये। मन्र को कारे डोये से फाॉधकय योगी को दे। योगी भॊगरिाय मा शुक्रिाय को ऩूिाामबभुख होकय ताफीज को गरे भें धायण कयें। १९॰ “ॐ नभो आदेश। तू ज्मा नावे, बूत ऩरे, प्रेत ऩरे, खफीस ऩरे, अरयष्ट ऩरे- सफ ऩरे। न ऩरे, तय गुरु िी, गोयखनाथ िी, फीद माहीॊ चरे। गुरु सॊगत, भेयी बगत, चरे भन्त्र, ईश्वयी वाचा।” विधध- उक्त भन्र से सात फाय „याख‟ को अमबभजन्रत कय उससे योगी के कऩार ऩय दटका रगा दें। नजय उतय जामेगी। २०॰ “ॐ नभो बगवते श्ी ऩाश्ववनाथाम, ह्ीॊ धयणेन्र-ऩद्मावती सदहताम। आत्भ-चऺु, प्रेत-चऺु, वऩशाच-चऺु-सवव नाशाम, सवव-ज्वय-नाशाम, त्रामस त्रामस, ह्ीॊ नाथाम स्वाहा।” विधध- उक्त जैन भन्र को सात फाय ऩढ़कय व्मजक्त को जर वऩरा दें। २१॰ “टोना-टोना िहाॉ चरे? चरे फड जॊगर। फडे जॊगर िा ियने ? फडे रुख िा ऩेड िाटे। फडे रुख िा ऩेड िाट िे िा ियफो ? छप्ऩन छुयी फनाइफ। छप्ऩन छुयी फना िे िा ियफो ? अगवाय िाटफ, वऩछवाय िाटफ, नौहय िाटफ, सासूय िाटफ, िाट-िूट िे ऩॊग फहाइफै, तफ याजा फरी िहाईफ।” विधध- „दीऩािरी‟ मा „ग्रहण‟-कार भें एक दीऩक के सम्भुख उक्त भन्र का २१ फाय जऩ कये। फपय आिश्मकता ऩडने ऩय बबूत से झाडे, तो नजय-टोना दूय होता है। २२॰ डाइन मा नजय झाडने का भन्र “उदना देवी, सुदना गेर। सुदना देवी िहाॉ गेर ? िेिये गेर ? सवा सौ राख ववचधमा गुन, लसखे गेर। से गुन लसख िे िा िैरे ? बूत िे ऩेट ऩान ितर िय दैरे। भारु राती, पाटे छाती औय पाटे डाइन िे छाती। डाइन िे गुन हभसे खुरे। हभसे न खुरे, तो हभये गुरु से खुरे। दुहाई ईश्वय-भहादेव, गौया-ऩाववती, नैना-जोचगनी, िाभरु-िाभाख्मा िी।” विधध- फकसी को नजय रग गई हो मा फकसी डाइन ने कुछ कय ददमा हो, उस सभम िह फकसी को ऩहचानता नहीॊ है। उस सभम उसकी हारत ऩागर-जैसी हो जाती है। ऐसे सभम उक्त भन्र को नौ फाय हाथ भें „जर‟ रेकय ऩढ़े। फपय उस जर से नछॊटा भाये तथा योगी को वऩराए। योगी ठीक हो जाएगा। मह स्िमॊ-मसद्ध भन्र

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है, केिर भाॉ ऩय विश्िास की आिश्मकता है। २३॰ नजय झायने के भन्र १॰ “हनुभान चरै, अवधेसरयिा वृज-वण्डर धूभ भचाई। टोना-टभय, डीदठ-भूदठ सफिो खैचच फराम। दोहाई छत्तीस िोदट देवता िी, दोहाई रोना चभारयन िी।” २॰ “वजय-फन्द वजय-फन्द टोना-टभाय, डीदठ-नजय। दोहाई ऩीय ियीभ, दोहाई ऩीय असयप िी, दोहाई ऩीय अताप िी, दोहाई ऩीय ऩनारु िी नीमि भैद।” विधध- उक्त भन्र से ११ फाय झाये, तो फारकों को रगी नजय मा टोना का दोष दूय होता है। २४॰ नजय-टोना झायने का भन्र “आिाश फाॉधो, ऩातार फाॉधो, फाॉधो आऩन िामा। तीन डेग िी ऩृथ्वी फाॉधो, गुरु जी िी दामा। क्जतना गुतनमा गुन बेजे, उतना गुतनमा गुन फाॊधे। टोना टोनभत जादू। दोहाई िौरु िभच्छा िे, नोनाऊ चभाइन िी। दोहाई ईश्वय गौया-ऩाववती िी, ॐ ह्ीॊ पट् स्वाहा।” विधध- नभक अमबभजन्रत कय खखरा दे। ऩशुओॊ के मरए विशेष पर-दामक है। २५॰ नजय उतायने का भन्र “ओभ नभो आदेश गुरु िा। चगयह-फाज नटनी िा जामा, चरती फेय िफूतय खामा, ऩीवे दारु, खाम जो भाॊस, योग-दोष िो रावे पाॉस। िहाॉ-िहाॉ से रावेगा? गुदगुद भें सुरावेगा, फोटी-फोटी भें से रावेगा, चाभ-चाभ भें से रावेगा, नौ नाडी फहत्तय िोठा भें से रावेगा, भाय-भाय फन्दी िय रावेगा। न रावेगा, तो अऩनी भाता िी सेज ऩय ऩग यखेगा। भेयी बक्तत, गुरु िी शक्तत, पुयो भन्त्र ईश्वयी वाचा।” विधध्- छोटे फच्चों औय सुन्दय जस्रमों को नजय रग जाती है। उक्त भन्र ऩढ़कय भोय-ऩॊख से झाड दें, तो नजय दोष दूय हो जाता है। २६॰ नजय-टोना झायने का भन्र “िालर देवव, िालर देवव, सेहो देवव, िहाॉ गेलर, ववजूवन खण्ड गेलर, कि िये गेलर, िोइर िाठ िाटे गेलर। िोइर िाठ िादट कि ियतत। पराना िा धैर धयाएर, िैर ियाएर, बेजर बेजामर। डडठ भुठ गुण-वान िादट िटी ऩातन भस्त ियै। दोहाई गौया ऩाववतत ि, ईश्वय भहादेव ि, िाभरु िभख्मा भाई इतत सीता-याभ-रक्ष्भण-नयलसॊघनाथ ि।” विधध्- फकसी को नजय, टोना आदद सॊकट होने ऩय उक्त भन्र को ऩढ़कय कुश से झाये। नोट :- नजय उतायते सभम, सबी प्रमोगों भें ऐसा फोरना आिश्मक है फक “इसको फच्चे की, फूढ़े की, स्री की, ऩुरूष की, ऩशु-ऩऺी की, दहन्दू मा भुसरभान की, घय िारे की मा फाहय िारे की, जजसकी नजय रगी हो,

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िह इस फत्ती, नभक, याई, कोमरे आदद साभान भें आ जाए तथा नजय का सतामा फच्चा-फूढ़ा ठीक हो जाए। साभग्री आग मा फत्ती जरा दूॊगी मा जरा दूॊगा।´´

बैयव वशीियण भन्त्र

बैयि िशीकयण भन्र १॰ “ॐनभो रराम, कवऩराम, बैयिाम, बररोक-नाथाम, ॐ ह्ीॊ पट् स्िाहा।” विधध्- सिा-प्रथभ फकसी यवििाय को गुग्गुर, धूऩ, दीऩक सदहत उऩमुाक्त भन्र का ऩन्रह हजाय जऩ कय उसे मसद्ध कये। फपय आिश्मकतानुसाय इस भन्र का १०८ फाय जऩ कय एक रौंग को अमबभजन्रत रौंग को, जजसे िशीबूत कयना हो, उसे खखराए। २॰ “ॐ नभो कारा गोया बैरॊ िीय, ऩय-नायी सूॉ देही सीय। गुड ऩरयदीमी गोयख जाणी, गुद्दी ऩकड दे बैंर आणी, गुड, यक्त का धरय ग्रास, कदे न छोडे भेया ऩाश। जीित सिै देियो, भूआ सेिै भसाण। ऩकड ऩरना ल्मािे। कारा बैंर न रािै, तो अऺय देिी कामरका की आण। पुयो भन्र, ईश्ियी िाचा।” विधध्- २१,००० जऩ। आिश्मकता ऩडने ऩय २१ फाय गुड को अमबभजन्रत कय साध्म को खखराए। ३॰ “ॐ भ्ाॊ भ्ाॊ बूॉ बैयिाम स्िाहा। ॐ बॊ बॊ बॊ अभुक-भोहनाम स्िाहा।” विधध्- उक्त भन्र को सात फाय ऩढ़कय ऩीऩर के ऩत्ते को अमबभजन्रत कये। फपय भन्र को उस ऩत्ते ऩय मरखकय, जजसका िशीकयण कयना हो, उसके घय भें पेंक देिे। मा घय के वऩछिाडे गाड दे। मही फक्रमा „नछतिन‟ मा „पुयहठ‟ के ऩत्ते द्िाया बी हो सकती है।

श्ी बैयव भन्त्र

श्री बैयि भन्र “ॐ गुरजी कारा बैरॉ कवऩरा केश, काना भदया, बगिाॉ बेस। भाय-भाय कारी-ऩुर। फायह कोस की भाय, बूताॉ हात करेजी खूॉहा गेडडमा। जहाॉ जाऊॉ बैरॉ साथ। फायह कोस की रयवद्ध ल्मािो। चौफीस कोस की मसवद्ध ल्मािो। सूती होम, तो जगाम ल्मािो। फैठा होम, तो उठाम ल्मािो। अनन्त केसय की बायी ल्मािो। गौया-ऩािाती की विनछमा ल्मािो। गेल्माॉ की यस्तान भोह, कुिे की ऩखणहायी भोह, फैठा फाखणमा भोह, घय फैठी फखणमानी भोह, याजा की यजिाड भोह, भदहरा फैठी यानी भोह। डाफकनी को, शाफकनी को, बूतनी को, ऩरीतनी को, ओऩयी को, ऩयाई को, राग कूॉ, रऩट कूॉ, धूभ कूॉ, धक्का कूॉ, ऩरीमा कूॉ, चौड कूॉ, चौगट कूॉ, काचा कूॉ, करिा कूॉ, बूत कूॉ, ऩरीत कूॉ, जजन कूॉ, याऺस कूॉ, फरयमों से फयी कय दे। नजयाॉ जड दे तारा, इत्ता बैयि नहीॊ कये, तो वऩता भहादेि की जटा तोड तागडी कये, भाता ऩािाती का चीय पाड रॉगोट कये। चर

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डाफकनी, शाफकनी, चौडूॉ भैरा फाकया, देस्मूॉ भद की धाय, बयी सबा भें द्मूॉ आने भें कहाॉ रगाई फाय ? खप्ऩय भें खाम, भसान भें रौटे, ऐसे कारा बैरॉ की कूण ऩूजा भेटे। याजा भेटे याज से जाम, प्रजा भेटे दूध-ऩूत से जाम, जोगी भेटे ध्मान से जाम। शब्द साॉचा, ब्रह्भ िाचा, चरो भन्र ईश्ियो िाचा।” विधध्- उक्त भन्र का अनुष्ठान यवििाय से प्रायम्ब कयें। एक ऩत्थय का तीन कोनेिारा टुकडा मरकय उसे अऩने साभने स्थावऩत कयें। उसके ऊऩय तेर औय मसन्दूय का रेऩ कयें। ऩान औय नारयमर बेंट भें चढािें। िहाॉ ननत्म सयसों के तेर का दीऩक जरािें। अच्छा होगा फक दीऩक अखण्ड हो। भन्र को ननत्म २१ फाय ४१ ददन तक जऩें। जऩ के फाद ननत्म छाय, छयीरा, कऩूय, केशय औय रौंग की आहुनत दें। बोग भें फाकरा, फाटी फाकरा यखें (विकल्ऩ भें उडद के ऩकोडे, फेसन के रड्डू औय गुड-मभरे दूध की फमर दें। भन्र भें िखणात सफ कामों भें मह भन्र काभ कयता है।

भोहन

३॰ दृजष्ट द्िाया भोहन कयने का भन्र “ॐ नभो बगिनत, ऩुय-ऩुय िेशनन, सिा-जगत-बमॊकरय ह्ीॊ ह्ैं, ॐ याॊ याॊ याॊ क्रीॊ िारौ स् चि काभ-फाण, सिा-श्री सभस्त नय-नायीणाॊ भभ िश्मॊ आनम आनम स्िाहा।” विधध्- फकसी बी मसद्ध मोग भें उक्त भन्र का १०००० जऩ कये। फाद भें साधक अऩने भुहॉ ऩय हाथ पेयते हुए उक्त भन्र को १५ फाय जऩे। इससे साधक को सबी रोग भान-सम्भान से देखेंगे। ४॰ तेर अथिा इर से भोहन क॰ “ॐ भोहना यानी-भोहना यानी चरी सैय को, मसय ऩय धय तेर की दोहनी। जर भोहूॉ थर भोहूॉ, भोहूॉ सफ सॊसाय। भोहना यानी ऩरॉग चढ़ फैठी, भोह यहा दयफाय। भेयी बजक्त, गुर की शजक्त। दुहाई गौया-ऩािाती की, दुहाई फजयॊग फरी की। ख॰ “ॐ नभो भोहना यानी ऩरॉग चढ़ फैठी, भोह यहा दयफाय। भेयी बजक्त, गुर की शजक्त। दुहाई रोना चभायी की, दुहाई गौया-ऩािाती की। दुहाई फजयॊग फरी की।” विधध्- „दीऩािरी‟ की यात भें स्नानाददक कय ऩहरे से स्िच्छ कभये भें „दीऩक‟ जराए। सुगन्धफारा तेर मा इर तैमाय यखे। रोफान की धूनी दे। दीऩक के ऩास ऩुष्ऩ, मभठाई, इर इत्मादद यखकय दोनों भें से फकसी बी एक भन्र का २२ भारा „जऩ‟ कये। फपय रोफान की ७ आहुनतमाॉ भन्रोचाय-सदहत दे। इस प्रकाय भन्र मसद्ध होगा तथा तेर मा इर प्रबािशारी फन जाएगा। फाद भें जफ आिश्मकता हो, तफ तेर मा इर को ७ फाय उक्त भन्र से अबीभजन्रत कय स्िमॊ रगाए। ऐसा कय साधक जहाॉ बी जाता है, िहाॉ रोग उससे भोदहत होते हैं। साधक को सूझ-फूझ से व्मिहाय कयना चादहए। भन चाहे कामा अिश्म ऩूये होंगे।

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श्ी िाभदेव िा भन्त्र

श्री काभदेि का भन्र (भोहन कयने का अभोघ शस्र) “ॐ नभो बगिते काभ-देिाम श्रीॊ सिा-जन-वप्रमाम सिा-जन-सम्भोहनाम ज्िर-ज्िर, प्रज्िर-प्रज्िर, हन-हन, िद-िद, तऩ-तऩ, सम्भोहम-सम्भोहम, सिा-जनॊ भे िशॊ कुर-कुर स्िाहा।” विधी्- उक्त भन्र का २१,००० जऩ कयने से भन्र मसद्ध होता है। तद्दशाॊश हिन-तऩाण-भाजान-ब्रह्भबोज कये। फाद भें ननत्म कभ-से-कभ एक भारा जऩ कये। इससे भन्र भें चैतन्मता होगी औय शुब ऩरयणाभ मभरेंगे। प्रमोग हेतु पर, पूर, ऩान कोई बी खाने-ऩीने की चीज उक्त भन्र से अमबभजन्रत कय साध्म को दे। उक्त भन्र द्िाया साधक का फैयी बी भोदहत होता है। मदद साधक शरु को रक्ष्म भें यखकय ननत्म ७ ददनों तक ३००० फाय जऩ कये, तो उसका भोहन अिश्म होता है।

दशवन हेतु श्ी िारी भन्त्र

“डण्ड बुज-डण्ड, प्रचण्ड नो खण्ड। प्रगट देवव, तुदह झुण्डन िे झुण्ड। खगय ददखा खप्ऩय लरमाॊ, खडी िारिा। तागडदे भस्तङ्ग, ततरि भागयदे भस्तङ्ग। चोरा जयी िा, पागड दीपू, गरे पुर-भार, जम जम जमन्त। जम आदद-शक्तत। जम िारिा खऩय-धनी। जम भचिुट छन्दनी देव। जम-जम भदहया, जम भयददनी। जम-जम चुण्ड-भुण्ड बण्डासुय-खण्डनी, जम यतत-फीज बफडार-बफहण्डनी। जम तनशुम्ब िो दरनी, जम लशव याजेश्वयी। अभृत-मऻ धागी-धृट, दृवड दृवडनी। फड यवव डय-डयनी ॐ ॐ ॐ।।” विधध- नियारों भें प्रनतऩदा से निभी तक घृत का दीऩक प्रज्िमरत यखते हुए अगय-फत्ती जराकय प्रात्-सामॊ उक्त भन्र का ४०-४० जऩ कये। कभ मा ज्मादा न कये। जगदम्फा के दशान होते हैं।

श्ीसाफय-शक्तत-ऩाठ

श्ीसाफय-शक्तत-ऩाठ श्री „साफय-शजक्त-ऩाठ‟ के यधचमता „अनन्त-श्रीविबूवषत-श्रीददव्मेश्िय मोधगयाज‟ श्री शजक्तदत्त मशिेन्राचामा नाभक कोई भहात्भा यहे है। उनके उक्त ऩाठ की प्रत्मेक ऩॊजक्त यहस्म-भमी है। ऩूणा श्रद्धा-सदहत ऩाठ कयने िारे को सपरता ननजश्चत रऩ से मभरती है, ऐसी भान्मता है। फकसी काभना से इस ऩाठ का प्रमोग कयने से ऩहरे तीन याबरमों भें रगाताय इस ऩाठ की १११ आिृजत्तमाॉ „अखण्ड-दीऩ-ज्मोनत‟ के सभऺ फैठकय कय रेनी चादहए। तदनन्तय ननम्न प्रमोग-विधध के अनुसाय ननददाष्ट सॊख्मा भें ननददाष्ट कार भें अबीष्ट काभना की मसवद्ध मभर सकेगी।

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प्रमोग-विधध्- १॰ रक्ष्भी-प्राजप्त हेतु नैऋत्म-भुख फैठकय दो ऩाठ ननत्म कयें। २॰ सन्तान-सुख-प्राजप्त हेतु ऩजश्चभ-भुख फैठकय ऩाॉच ऩाठ तीन भास तक कयें। ३॰ शरु-फाधा-ननिायण हेतु उत्तय-भुख फैठकय तीन ददन साॊम-कार ग्मायह ऩाठ कयें। ४॰ विद्मा-प्राजप्त एिॊ ऩयीऺा उत्तीणा कयने हेतु ऩूिा-भुख फैठकय तीन भास तक ३ ऩाठ कयें। ५॰ घोय आऩजत्त औय याज-दण्ड-बम को दूय कयने के मरए भध्म-याबर भें नौ ददनों तक २१ ऩाठ कयें। ६॰ असाध्म योग को दूय कयने के मरए सोभिाय को एक ऩाठ, भॊगरिाय को ३, शुक्रिाय को २ तथा शननिाय को ९ ऩाठ कयें। ७॰ नौकयी भें उन्ननत औय व्माऩाय भें राब ऩाने के मरए एक ऩाठ सुफह तथा दो ऩाठ याबर भें एक भास तक कयें। ८॰ देिता के साऺात्काय के मरए चतुदाशी के ददन याबर भें सुगजन्धत धूऩ एिॊ अखण्ड दीऩ के सदहत १०० ऩाठ कयें। ९॰ स्िप्न भें प्रश्नोत्तय, बविष्म जानने के मरए याबर भें उत्तय-भुख फैठकय ९ ऩाठ कयने से उसी याबर भें स्िप्न भें उत्तय मभरेगा। १०॰ विऩयीत ग्रह-दशा औय दैिी-विघ्न की ननिृजत्त हेतु ननत्म एक ऩाठ सदा श्रद्धा से कयें। ऩूिा-ऩीदठका ।। विननमोग ।। श्रीसाफय-शजक्त-ऩाठ का, बुजॊग-प्रमात है छन्द । बायद्िाज शजक्त ऋवष, श्रीभहा-कारी कार प्रचण्ड ।। ॐ क्रीॊ कारी शयण-फीज, है िामु-तत्त्ि प्रधान । कामर प्रत्मऺ बोग-भोऺदा, ननश-ददन धये जो ध्मान ।। ।। ध्मान ।। भेघ-िणा शमश भुकुट भें, बरनमन ऩीताम्फय-धायी । भुक्त-केशी भद-उन्भत्त मसताॊगी, शत-दर-कभर-विहायी ।।

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गॊगाधय रे सऩा हाथ भें, मसवद्ध हेतु श्री-सन्भुख नाचै । ननयख ताण्डि छवि हॉसत, कामरका „ियॊ ब्रूदह‟ उिाचै ।।

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