I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page1
डाँ . पी. त पत मा
र डर
,
ह द वभाग,
बी.सी.ए.स.कालेज,
बाप ला-
522101, आँ देश,
भारत
जीवन और सा ह य दोन म नयी जा ृ त क पूण त ठा ववेद –युग के बाद ह संभव हो सक । नयी चेतना ने सौ दय भावना का अनेक
दशाओं म वकास और सार कया। छायावाद ने
अपनी ृि ट और सौ दय-चेतना को उप नषद क आ याि मक परंपरा से जोडकर मा यता ा त करने का य न कया। पर वा तव म छायावाद मानवीय
संवेदना
,
सावभौ मक-सां ृ तक चेतना और सू मसौ दय भावना आधु नक ृि ट क ह देन है। आ याि मकता आवरण या साधना मा है।
स दयवाद ृि ट से छायावाद का य का ह द सा ह य म सव प र थान है। क वय क मूल ेरणा का ोत स दय ह है। उसी क अनुभू त म उनक क पना और भावना उ ेिजत हुई। स दय को ह उ ह ने जीवन का स य माना है और उसे
शा वत आ याि मक स य भी घो षत कया है।
छायावाद का यधारा म स दय चेतना का अ य त वक सत तथा समृ द प देखने को
मलता है। ह द क वता म मानवीय
,
ा ृ तकतथा भावा मक स दय का जैसा उ घाटन
छायावादयुग म हुआ है
,
पूववत युग म वैसा नहहो पाया है। गहर संवेदनशीलता और अ त ृि ट के योग से छायावाद क वय का स दय च ण अ य त नूतन एवं सजीव है। छायावाद क वय क सौ
दय-ृि ट उनक सौ दय स ब धी वचारधारा से पु ट
एवं अनु ा णत है।
स दय
“अं ेजी म स दय का पयायवाची श द
‘
यूट’
है। आ फोड श दकोश के अनुसार‘
यूट’
मानवीय सुख
,
प या इतर व तुओं म आ ृ त,
अनुताप
,
रंग आ द गुण का ऐसा सौभा य है जोने को आनंद देता है
,
जो नै तक तथा बौि दकभावना का भी प रतोष करता है।
’’
1छायावाद क वता और सौ दय भावना
सौ दय-भावना छायावाद युग क एक मुख ृ है। इस युग के सभी क वय म सौ दय क एक नूतन चेतना प रल त होती है। यापक सौ दय चेतना से सुस प न होकर इन क वय ने
छायावाद क वय क सौदयचेतना
हंदI n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page2 अपने जीवन-दशन के प म ेम को वीकार
कया। ये क व थूल तथा मांसल सौ दय के त आ ृ ट न होकर आ मा के सौ दय पर मु ध होते है । इसी कारण से इनक क वताओं म सू म सौ दय क त ठा हुई है। इनक सब से बडी उपलि द यह है। ा ु तक तथा मानवीय सौ दय इन क वय के का य क ेरणा है।
साद ने स दय त व के त अपना समु चत ृि टकोण तुत कया है। उनके अनुसार स दय यि त या पदाथ का बा य गुण मा नह
है
,
वह एक ई वर य वभू त है य क उसम सदा‘
चत’
क सा ात द ि त रहती है। साद क स दयस ब धी यह धारणा अ य त उदा है—
“उ वल वरदान चेतना का स दय िजसे सब
कहते है
,
िजसम अन त अ भलाषा के सपने सब जगते
रहते है।
’’
2पंत ने भी सौ दय-चेतना को अ य धक
मह व दया है। क व के अनुसार सौ दय का सव प र गुण उसक सू मता अथवा अंतमु वीनता।
इसी गुण के कारण क व स दय क ा
,
अथवा शुि द बुि द का काश समझता है—
“ वह ा का स य व प
,
ृदय म बनताणय अपार
,
लोचन म लाव य अनूप
,
लोक सेवा म शवअ वकार।’’3
‘
नराला’
क सौ दय स ब धी अवधारणा भीअ य त मह वपूण है। नराला ई वर
,
सौ दय,
वैभव और वलास के क व है। उ ह ने पंचेि य बोध से ा त सौ दयानुभू त के त वशेष लालसा
कट क है—
“ पश प म अनुभव रोमांच
हष प म प रचय
वनोद सुख गंध म
रस म म जना द
श द म अलंकार....”4
महादेवी का स दय-चेतना स ब धी ृि टकोण
आधयाि मक अथवा रह या मक है।
महादेवी के अनुसार छायावाद सू म सौ दयानुभू त के जय-घोष का काल है। उ ह के श द म “ ...
थूल सौ दय क नज व आ ृ य से थके हुए और
पर परागत नयम ृंखला से ऊबे हुए यि तय को
फर उ ह रेखाओं म बँधे थूल का न तो यदाथ च ण चकर हुआ और न उसका ढगत आदश भाया। उ ह नवीन प रेखाओं म सू
म-सौ दयानुभू त क आव यकता थी
,
जो छायावाद मपूण हुई।” 5
छायावाद सौ दय क वशेषताएँ
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यह है क क वय क रचनाओं म सौ दय
,
पदाथके बा यगुण से परे सू म भावना के े म व नयोिजत हुआ। पूवव त क वय क ृि ट क वय
के बा य (रंग
,
पाकार,
पश आ द इि यपरक)सौ दय तक ह सी मत रहती थी क तु छायावाद क व आ त रक अथवा सू म सौ दय क ओर उ मुख हुए। बा य सो दय से अ त र त स दय क
ओर य थाना तर सहता ह नह हुआ
,
उसकामक वकास प ट प रल त होता है। इस
वकास म म तीन ट सोपान देखे जा सकते
है
---(अ) पूण थूल
इ कार क रचनाओं म यि त या व तु के बाहयाकार का ह अ धक वणन कया जाता है।
क तु यहाँ यह ट य है क
“
छायावाद क वताक थूल सौ दय वणन र तकाल न थूल सौ दय व न क अपे ा सू म है य क छायावाद क वता क थूल सौ दय–वणन म सुकुमार तथा
उदा भाव का सं पश है। य द हम
‘
कामायनी’
केदा के सौ दय वणन अथवा
‘
आँसू’
क न यकाके नख शख-वणन को देखे तो यह बात सहज ह
प ट हो जाती है।
’’
6(आ) थूल-सू म के लए
इस कार क रचनाओं म क व का ृदय सौ दय क भावना तथा उसक ेरकव तु या
आल बन-दोन ह समभाव से वभािजत रहता है। क व के अंतरतम म आल बन क स ा क
उपि थ त आ द से अंत तक बनी रहती है। उदाहरण
के लए पंत क
‘
भावी प नी के त’
तथा नरालाक
‘
सरोज- ृ त’
क वताएँ देखी जा सकती है।(इ) पूण सू म
इस कार क रचनाओं म यि त या व तु का आधार नाम मा का ह रहता है यि त या
व तु क भावना
,
अथवा उससे उ प न उ लास,
रोमांच अथवा प दन आ द शेष रह जाता है। “यह छायावाद का क व मान अपने अि त व क
साथकता मा णत करता है। इस ि थ त का सव च वकास स दय के ेरक प या आल बन
के अलौ कक करण
,
रह यीकरण अथवाआ या मीकरण म होता है
,
और भौ तक पदाथ याआल बन क व को पूणतः अतीि य
,
सू म,
फेनोपम
,
क पनावेि टत,
धू मल क तु उ जवलव उदा चेतना के व णम काश म नमि जत
हुआ सा अनुभूत होता है।
’’
7२. छायावाद क सौ दय- ृि ट वषयी धान है। “ िजसे अ त ृि ट का स दय दशन कहा गया है उसम वषय क ह धानता होती है। वषय जैसा
होता है
,
उससे थोडा अलग ह कर,
वषयी उसपरI n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page4
व तु न ठ सौ दय - पदाथ का थूल सौ दय है
,
उसके बा य पाकार का प रचायक है। यि त न ठ सौ दय पदाथ को देखती हुई टा क आँख का
सौ दय है
,
वह टा क आलोपलि ध है,
उसमउसके नजी राग का समावेश होता है। यह कारण है क कोई एक ह व तु एक यि त को असु दर और दूसरे को सु दर दखाई पडती है। सौ दय क इस यि तवाद धारणा के आधार पर इस न कष तक आसानी से पहूँचा जा सकता है क सौ दय क वा त वक ि थ त व तु या पदाथ म नह दशक के मनोराग म होती है। “ ... छायावाद क स पूण साधना यि त न ठ रह है। अतएव छायावाद का य म तफ लत सो दय– ृि ट भी यि त धान
है।
’’
8 व तुतः छायावाद सौ दय- च ण छायावादक वय क वैयि तक रागा मक अनुभू तय का तफलन है।
३. छायावाद क वय ने सू म
,
आंत रक औरभावा मक सौ दय को अपना ल य बनाया
,
इसकारण उनक सौ दय–साधना आदशवाद ह हो गई है। यि तवाद जीवन- ृि ट ायः आद वाद के
प म ह फु टत होती है। छायावाद क वय ने य अथवा ृ त के सव े ठ और भ यतम व प को ह तुत कया। मनु दा को यो
सना-नझर के प म देखते है---
“कौन हो तुम खींचते य मुझे अपनी ओर
,
और ललचाते वयं हटते उधर क ओर
यो सना – नझर
?
ठहरती ह नह यहआँख
,
तु ह कुछ पहचानने क खो गई सी साख।
’’
9सौ दय क आद वाद प रक पना म कह ं-कह ं नै तकता का ेपण भी कया गया है। पंत जी या के साि न य क अनुभू त के च ण म धा मक अ तुत का योग करते है---
“
तु हारे छूने म था ाण,
संग म पावनगंगा- नान
?
तु हार वाणी म क या ण वे ण क लहर
का गान
?”
10छायावाद क वय ने िजस कार ेम का
आदश प तुत कया
,
उसी कार आदश सौ दयको भी मू तमान कया।
(४) छायावाद क वय क सौ दय– ृि ट
क पना धान है। व तुतः छायावाद सौ दय –चेतना और क पना का गाढ स ब ध है। छायावाद क व अपने का य म व णत य यि त या य पदाथ
को एक अ भुत और अपूव व तु सम ता है
,
वहउसे इस कुि सत और ू र संसार से दूर अपनी का प नक ृि ट के कसी शाँत और नीरव कोने म ले जाना चाहता है। वह क पना के वारा अपने
य म व व क स पूण ीवैभव
,
और स गुण कोति ठत कर देना चाहता है। इस ृ के
I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page5 जाती है। छायावाद का य म व णत सौ दय केवल
क पना-जगत क व तु तीत होती है।
(५) छायावाद सौ दय का स ब ध रह य-भावना के साथ भी है। इस रह या मकता का
मूल-ब दु कसी अ य त के त िज ासा अथवा औ सु य क भावना है। यह िज ासा कभी तो
ा ृ तक सौ दय के त कट क गई है
,
औरकभी मानव सौ दय के त । सूय
,
च आ दन या है
?
मेघ,
उषा,
स या आ द कहा सेआते है आ द न ृ त के त वाभा वक िज ासा के प रणाम है। क तु उसी कार मानवीय सौ दय को देखकर भी भावुक छायावाद क व के
मन म ये न उठे क अंग क द ि त
,
उनकसुकुमारता और रमणीयता कहाँ से आती है
,
कंठ केवर क मधुरता का ोत कहाँ है
?
यह यौवन,
यहफू त कस सौ दय-सागर के अंश ह
?
मानव-सौ दय के त इस कार का िज ासा-भाव
छायावाद सौ दय-चेतना क अनूठ वशेषता है। ऐसे िज ासा-भाव ह द सा ह य के अ य कसी युग क क वता म दखाई नह देता।
(६) सौ दय पासक क व ायः वराट
,
भ यऔर असाधारण यि तय अथवा व तुओं के त ह आ ृ ट हुआ करते है क तु छायावाद क वय
क वशेषता यह है क वे उदा
,
भ य औरअसाधारण प के साथ
,
साधारण,
सौ य तथाचरप र चत प के त भी पया त प से
आक षत हुए है। साद ने
‘
कामायनी’
म जहाँ एकओर दा के भ य वैभव पूण व प का च ांकन कया है वहाँ दूसर ओर उसके साधारण प का भी पूण सजीवता के साथ व न कया है। इसी कार
पंत ने जहाँ
‘
गुंजन’
म अ सरा क भ य ृि ट कहै
,
वहाँ‘
ा य’
तक पहूँचते-पहूँचते सरल वभोले-भाले ा य-सौ दय के त अपनी च द शत क है।
(७) र तकाल न तथा ववेद काल न क वय क ृि ट केवल ी-सौ दय तक ह स मत रह । उ ह ने पु ष सौ दय के त अपने ने ब द रखे ।
क तु छायावाद काल के क वय ने य -त पु ष-सौ दय का भी पूण सजीवता के साथ च ण कया है। यहाँ यह ट य है क पूण मानव-सौ दय ी और पु ष दोन म सि म लत सौ दय का तफलन है। छायावाद का य म जहाँ ी के कोमल सौ दय
का च ण हुआ है
,
वहाँ पु ष के कठोर सौ दय काभी।
(८) ह द क वता म सौ दय- च ण के े म आ दकाल से ह नख- शख वणन क पर परा का नवाह होता आया है। ह द के र तकाल म तो यह क वता क मा य प रपाट
ह थी। छायावाद क वता म यह पर परा ायः समा त हो गई। आँसू क ना यका के वणन म
अथवा
‘
कामायनी’
क दा के च ण म साद नेI n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page6
है कंतु यह र तकाल न शैल से भ न है
,
उसकायोग भाव-सौ दय क यंजना के लए कया गया है।
सं ेप म छायावाद सौ दय –भावना क ये ह मु य वशेषताएँ है।
छायावाद सौ दय के व वध प
छायावाद सौ दय-चेतना अनेक दशाअओं म सा रत हुई है।
छायावाद क वय क सौ दय- ृि ट का थम उ मेष ृ त के मा यम से हुआ। उ ह ने ृ त के मा यम से हुआ। उ ह ने ृ त के रा श-रा श सौ दय के च ण का यास कया है। छायावाद सौ दय चेतना का दूसरा मा यम नार है। यहाँ हम छायावाद क वय वारा तुत नार सौ दय का
ववेचन करगे।
(अ) नार सौ दय प
म यकाल न क व ने नार का जो वासना-उ बोधक और पु ष के लए ब धनमय व प अं कत कया था वह छायावाद काल म आकर समा त हो गया। र तकाल न क व को नार क
भ हे धनुष के समान
,
उसके ने तीर के समानऔर उसक हँसी वघुत के समान लगते थे
,
क तुछायावाद क व को उसक भौहे म आकाश
,
उसकेने म मू तमान ेम और उसक हँसी म शैशव क सरलता दखाई द । छायावाद म नार के बा य
सौ दय का जो वणन हुआ
,
उसम भी ब हरंगवणन जैसी थूलता नह है। यह बात नह क छायावाद क व नार के प और अंग-सौ दय पर मु ध न हुए ह । वा तव म इन क वय ने नार के बा य प और अंग- यंग वणन क नई-नई
व धयाँ आ व ृ त क और कतने ह आ लादकार
और द य प च तुत कए
,
क तु इनक वय ने नार के बा य प-सौ दय क न ृ य म एक अ भनव सू मता का वधान कया। साद क दा का प-सौ दय वणन इस ृि ट से
अ य त उ ृ ट बन पडा है। दे खए—
“
नील प रधान बीच सुकुमार खुल ृदुलअधकुला अंग
,
खला हो य बजल का फूल
,
मघ वन बीचगुलाबी रंग। आह
,
वह मुख,
पि चम के योमबीच जब घरते हो घन याम
,
अ ण र वम डलउनको भेद दखाई देता हो छ व धाम।
’’
11साद के
‘
आँसू’
क ना यका का एक ऐसा ह चऔर ल िजए---- “बाँधा था वधु को कसने इन
काल जंजीर से
,
म णवाले फ लय का मुख यभरा हुआ ह र से ।
काल आँख म कतनी यौवन के मद क
लाल
,
मा नक म दरा से भर द कसने नीलमI n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page7
नाव नराल
,
काला पानी वेला सी है अंजन रेखा काल ।
’’
12बा य पाकार का व न होते हुए भी ये च अनुभू त गांभीय तथा आंत रक सौ दय चेतना से अनु ा णत है। थूल अंग–वणन म भी क व पाकार क नाप-जोख तक न जाकर अंग क काि त
कोमलता
,
सहरन,
पुलकन आ द सू म औरसुकुमार प क ओर ह अ धक गई है।
पंत जी के नार च भी सुकुमारता तथा सू मता से अ भमि डत है। पंतजी क क वता म य -त कुछ ऐसे नार – च भी खोजे जा सकते है िज म थूल सौ दय के त ती ऐि कता दखाई देती है। उदाहरणाथ न न पंि तयाँ ट य है िज म नार के मांसल सौ दय का मादक च ांकन हुआ है—
“तुम मु धा थी अ त भाव वण
,
उकेसे थे अ वय ----से उरोज
चंचल
,
ग भ,
हँसमुख उदार,
मै सलज
,
तु ह था रहा खोजx x
x
तुम ने अधर पर धर अधर
मने कोमल वधु भरा गोद,
था आ मसमपण सरल मधुर
मल गए सहजै मा ता मोद?”13
पंत के ारि भक च म सू मता,
क पनाशीलता, सुकुमारता तथा रंगीनी है। उ ह ने सौ दय के वरल से उपकरण जुटाने का यास
कया है। कंतु ‘ ा या’ तक आते आते क व अपने भ य और आकषक क पना जगत से उतर ृ वी पर आ जाता है। अब वह यदाथ भौ तक जगत के
त अपना ेम कट करता है, यह धरती उसे अपने सौ दय से अ भभूत कर लती है। ाम युवती का च ण वह पूण त ल नता से करता है ---
“उ मद यौवन से उभर घटा सी नव आसाढ क सु दर
अ तशयवरण, लथ, मंदचरण,
इठलाती आती ाम युव त वह गजग त सप डगर पर?
सकराती-पटु खलकाती-लटु-वह न मत ृि ट से देख उरोज के युग घर?
हँसती खलखल अबला-चंचल, य फूट पडा हो ोत सरल
मर फेनो वल दशन से अधर के तट ?”14
नराला के का य म नार के बा य एवं आंत रक दोन कार के सौ दय का उदघाटन हुआ है। नार के बा य-स दय का अंकन ‘पंचवट
I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page8 मलता है। ‘शूपनखा’ अनुपम सु दर है िजसका
नमाण सुंदर ृ त के सम त सौ दय्-भाग को खींचकर वधाता ( नराला) ने अपने हाथ से कया है। सदा से ह रा सी के प म च त होनेवाल ‘शूपनखा’ को ‘ललाम वामा’ के प म उपि थत
कया गया है—
“मीन-मदन फांसने क बंसी-सी व च नासा –-
फूल दल-तु य कोमल लाल ये कपोल गोल – -
चबुक चा और हँसी बजल -सी –-
भोजन-ग ध-पु प जैसे यारा यह मुख
म डल।’’15
लहराते केश-काल, स मोहन–शर छोडती भौह, मदो म कार ने , बंसी सी व च ना सका,
फूलदल, तु य गोल-कपोल, कपात-क ठ, बाहुव ल कर सरोज आ द व वध ा ृ तक पदाथ का उपमान प म योग करके सौ दय का जो च
न मत कया गया है उसम नार का प-सौ दय अपने सम त हाव-भाव के साथ भासमान हो उठा है।
महादेवी क सौ दयानुभू त का आधार ृ त है—इस लए सू म अथवा मान सक आधार हण
कए है। ना यका के प सौ दय के लए कवइ ी ने ृ त के सौ दयवधक उपकरण का आधार हण कया है। बसंत रजनी के मा यम से ल जाशील
मु ध ना यका के सौ दय ृंगार का च ण न न पंि तय म देखा जा सकता है—
“तारकमय नव वेणी बंधन
शीश-फूल कर श श का नूतन
रि म-वलय सत धन अवगु ठन
मु ताहल अ भराम बधा दे
चतवन से अपनी !
पुलकती वा वसंत रजनी ।’’16
सौ दयानुभू त म ‘रजनी’ का वशेष मह व है। भले ह वह तार से खल- खलाती रजनी हो या वस त रजनी। कवइ ी क ृि ट ृ त स दय म अ धक रह है। इस कार के च ण म भी महादेवी
का झुकाव आ याि मकता क ओर अ धक रहा है।
व तुतः छायावद क वता म नार सौ दय के अग णत च उपल ध है। इन च म य द एक ओर सू म द शता और भ य क पना के दशन होते है तो दूसर ओर सादगी और वाभा वकता के त अ भ च क ।
नार सौ दय (शील अथवा अ तः सौ दय)
नार के बा य सौ दय का च ण छायावाद सौ दय भावना का उतना मह वपूण प नह है िजतना मह वपूण है नार के आ त रक सौ दय का
I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page9 नार के त शील के मु य आधार—- दया, क णा,
ममता, सेवा, सहानुभू त, समपण, याग आ द द य गुण है।
‘कामायनी” म दा के शील का अ य त वशदता के साथ च ण हुआ है। दा का
यि त व भारतीय नार के यागपूण आ मसमपण का त न ध व करता है। उसके च र के मा यम से साद ने नार मा के लए ये उ गार कट कए है---
“नार , तुम केवल दा हो व वास रजत नग पद-तल म
पीयूष ोत सी बहा करो जीवन के सु दर
समतल म।
’’
17पंत ने भी नार के शील का मु तक ठ से गुण गान कया है। उनका वचार है—
“य द वग कह है ृ वी पर
,
तो वह नार उर के भीतर
,
दल पर दल खोल ृदय के तर
जब बठलाती स न होकर
वह अमर णय के शतदल पर्।
’’
18नराला ने भी नार म द य और अतीि य
सौ दय के द न कए है।
‘
तुलसीदास’
क र नावलम नार का अ य त तेज वी और ो वल प
कट हुआ है—
‘’
देखा,
शारदा नील वसनाहै स मुख वयं ृि ट रचना
जीवन-समीर शु च नः वसना
,
वरदाती।’’
19नराला के मन म नार -जा त के त जो क णा का भाव था उसी के प रणाम व प उ ह ने
युग-युग से ता डत और उपे त
‘
वधवा’
म भीसौ दय के दशन कए है—
“वह इ टदेव के मि दर क पूजा-सी
वह द प शखा सी शा त
,
भाव म ल न,
वह ू र् काल-ता डव क ृ त-रेखा-सी
,
वह टूटे त क ट लता- स-द न --- ।
’’
20महादेवी क क वता म भारतीय नार का कोमल लि जत मी लत सौ दय ा त होता है। वे
वयं को इसी प म देखती है। वे कहती है----
“ इसम उपजा यह नीरज ि मत
,
कोमल-कोमल लि जत मी लत
सौरभ सी लेकर मधुर पीर!”21
व तुतः नार के महान आि मक गुण म ह
I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page10
पु ष-सौ दय
छायावाद क वय ने पु ष-सौ दय को भी अपने च ण का वषय बनाया है। उ ह ने अ धक
मानवीय
,
ा ृ तक यदाथ के धरातल पर पु ष काच ण कर नए अ भ नवेश का प रचय दया है िजससे इन क वय के सौ दय भावना क यापकता का बोध होता है।
साद ने
‘
कामायनी’
म मनु के शार रकसौ दय एवं उसके तेज वी और शौयमय व प का वणन इस कार कया है—
“अवयव क ृढ मांसपे शयाँ
,
अजि वत थावीर अपार
फ त शराएँ
,
व थ र त का होता थािजनम संचार
च ता कातर बदन हो रहा
,
पौ ष िजसमओत- ोत
उधर उपे ामय यौवन का बहता भीतर
मधुमय ोत।
’’
22छायावाद क व ने पु ष का अ तः सौ दय का
भी च ण कया है। वीरता
,
उदारता,
परोपकार,
अ हंसा
,
याग आ द गुण आ त रक सौ दय के हअंगभूत गुण है। छायावाद युग म देश के लए जीवनो सग करनेवाले राजनी तक महापु ष म पया त सौ दय देखा गया। पंत जी वारा
आधु नक युग के अ यतम महापु ष महा मा गाँधी के शील-सौ दय का च ण इन श द म हुआ है---
“तुम माँसह न
,
र तह न,
है अि थ शेष,
तुमअि थह न
,
तुम शु द बु द आ मा केवल
,
हे चर पुराण,
हे चर नवीन ।
तुम पूण इकाई जीवन क
,
िजसम असारभवशू य ल न
,
आधार अमर
,
होगी िजस पर,
भावी कसं ृ त समासीन।”23
यघ प नराला के का य म नार -सौ दय का
अंकन ह अ धक हुआ है
,
तो भी पु ष-सौ दय केपया त च उसम वघमान है। तुलसीदास के बा य एवं आंत रक सौ दय को एक साथ उ घा टत
करनेवाला एक च ट य है ---
“युवक म मुख र न चेतन
समधीत-शा -का यालोचन
जो तुलसीदास
,
वह ा मण कुलद पक,
आयत- ृग
,
पु ट-देह,
गत-भयअपने काश म नःसंशय
I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page11 ।
’’
24यहाँ दै हक सौ दय के साथ नभय, संशयह न
और तभा स प न तुलसीदास के आंत रक सु दय
को अ त कुशलता से मुख रत कया गया है।
नराला क ृि ट त ण और व थ सौ दय
तक ह सी मत नह है
,
अ पतु वह उस द न-ह नमानव पर भी जाती है
,
अभाव ने िजसके सौ दय काहरण कर लया है।25 बादल के प म परोपकार
,
समाज्-सेवी
,
यागी,
याय य,
द न दयालु,
अनास त
,
मु त,
ग तशील और अपराजेय वीरपु ष का सौ दय देखते ह बनता है।26
डा. कुमार वमल के अनुसार-- “ यह युग
सौ दय-चेतना क उ मुि त का सार-काल है।
’’
27छायावाद सौ दय-भावना व थ
,
सु दर तथा प वहै। डा
.
नगे का यह कथन उ चत ह है क –“िजस क वता (छायावाद) ने नवीन सौ दय-चेतना जगाकर ृहत समाज क अ भ च का प रषकार
कया ....उस क वता का गौरव अ य है।28
अतः छायावाद क वय के सौ दय –बोध मूल
म स यं और शव के साथ–साथ मानव को स ग त
,
शि त और मुि त दान करने क यापक चेतना भी न हत है। न कषतः यह कहा जा सकता है क – छायावाद काल म सौ दयचेतना का उ मु त संचरण वराट से लेकर ृव तक समान प से हुआ
है।
*----*---*
संदभ- ंथ
1 स दय त व न पण –डा. एस. ट . नर संहाचार – ृ—- 5
2. का य और कला तथा अ य नब ध-
जयशंकर साद- - - ृ---36
3. प लव- - सु म ान दन प त – ृ--158
4. अना मका- सूयका त पाठ नराला -
ृ—182
5. महादेवी का ववेचना मक गघ- सं. गंगा साद पा डेय – ृ-–-65
6. रोमाि टक युगीन अँ ेजी क वता और छायावाद-
डा. ृ णमुरार म ---- - ृ—204
7. आधु नक ह द क वता म ेम और सौ दय –
डा. रामे वरलाल ख डेलवाल – - - ृ- 387
8.
‘
छायावाद’
सव ण माला – डा.रवी मर -ृ—114-115
9. कामायनी – जयशंकर साद - ृ- 87
I n t e r n a t i o n a l J o u r n a l o f E n g i n e e r i n g R e s e a r c h a n d S p o r t s S c i e n c e Page12 11. कामायनी- ( दा) जयशंकर साद -- ृ— 56
12. आँसू -- जयशंकर साद-- ृ-21-23
13. युगपथ - - पंत -- ृ- 40
14. ा या-( ामयुवती) –पंत -- ृ-17
15. पंचवट संग – प रमल- ृ—234
( नराला का य म सां ृ तक चेतना – जगद शच – ृ- 126)
16. महादेवी का का य सौ दय – डा. हुकुमचंद राजपाल- ृ-83
17. कामायनी- (ल जासग) – साद - ृ-116
18
.
ा य ( ीक वता) – पंत -- ृ- 8219. तुलसीदास- नराला - ृ- 86
20
.
वधवा- प रमल – नराला -- ृ- 11921. यामा- महादेवी वमा --- -- ृ- 113
(
महादेवी क क वता म सौ दय भावना--
डा.सी. तुलस मा- ृ-158)
22
.
कामायनी-( च ता सग) – साद- ृ- 1423. युगपथ (बापू के त क वता) – प त – ृ- 56
24. तुल सदास – नराला- छ द – 12
25. भ ुक- प रमल- नराला ृ-- 125
26. बादलराग- प रमल- नराला – ृ- 159-65
27. छायावाद का सौ दय-शा ीय अ यन- डा. कुमार वमल - ृ –113
28. आधु नक ह द क वता क मु य ृ याँ – डा. नगे – ृ-162
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