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© 2017 IJSRSET | Volume 3 | Issue 8 | Print ISSN: 2395-1990 | Online ISSN : 2394-4099

अभिज्ञानशाकुन्तलम् में वर्णववन्यासवक्रता

श्वेता अवस्थी

(शोधच्छात्रा)

राष्ट्रिय संस्कृत संस्कथान,

लखनऊ

शोधववषयसारः-वस्कतुतः काललदास काव्यसम्बन्धी अशेष दृष्ट्रयों से कननष्ट्िकानधष्ट्ित हैं। वक्रोष्ट्ि प्रयोग की दृष्ट्र से भी काववदास की सवोत्कृर ृवत अनभज्ञानशाकुन्तलम् में वक्रोष्ट्ि का प्रचुर ववलास प्राप्य होता है।काव्यशाष्ट्ियों में भी दण्डी ने स्कवाभावोष्ट्ि को तथा भोज ने स्कवाभावोष्ट्ि तथा रसोष्ट्ि दोनों को इसके क्षेत्र से पृथक् रखा है।वक्रोष्ट्ि को केवल अलङ्कार के रूप में ग्रहण करने वाले आचायों में मतभेद है-

वकसी ने इसकी गणना शब्दालङ्कारों में की है तो वकसी ने अथाालङ्कारों में भामह ने वक्रोष्ट्ि का सवाालङ्कार रूपों में स्कवीकार अवश्य वकया है। वकन्तु वक्रोष्ट्ि की स्कथापना उतने सुदृढ रूप मे नही की लजतने सुदृढ रूप में कुन्तक ने की है। कुन्तक ने वक्रोष्ट्ि को एक मात्र अलङ्कार कहकर समस्कत काव्यसौनेरेय का अन्तभााव वक्रोष्ट्ि में ही कर ललया है। आचाया कुन्तक के अनुसार विोष्ट्ि का अनभप्राय है प्रलसद्ध अनभधान का अवतक्रमण करने वाली सहृदय आह्लादकाररणी वैदग्ध की शोभा से युि भलणवत। प्रलसद्दि का अथा है शािावद तथा लोक व्यवहार में प्रयुि इसप्रकार वक्रोष्ट्ि शािावद में उपननबद्ध शब्दाथासम्बन्ध तथा प्रचललत व्यवहार सरणी का अवतक्रमण करने वाली है।

मुख्य शब्द- वक्रोष्ट्ि, कुन्तक, अनभज्ञानशाकुन्तल, ध्वनन, काललदास।

वस्कतुतः काललदास काव्यसम्बन्धी अशेष दृष्ट्रयों से कननष्ट्िकानधष्ट्ित हैं। वक्रोष्ट्ि प्रयोग की दृष्ट्र से भी काववदास की सवोत्कृर ृवत अनभज्ञानशाकुन्तलम् में वक्रोष्ट्ि का प्रचुर ववलास प्राप्य होता है। कववकुलगुरूमहाकववकाललदास के सम्बन्ध में प्रलसद्दद्ध

है-पुरा कवीनाां गर्नाप्रसङ्गे, कभनष्ठिकाभधष्ठितकाललदासः।

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वक्रोष्ट्ि का सांकेवतक अथा है- वक्र रूप में अथाात घुमा विराकर ववषय का कथन कववयों ने इसी के आधार पर वक्रोष्ट्ि का प्रयोग वाक्छल, पररहासकथन, क्रीडालाप, ववदग्धवचन आवद अथों में वकया है। वकन्तु काव्यशाष्ट्ियों ने पृथक् पृथक् आशयॆ में इस शब्द का प्रयोग वकया है। वकसी ने इसे अवतशयोष्ट्ि का पयााय कहकर सवाालङ्काररूपा स्कवीकार वकया है तो वकसी ने इसे अलङ्कार मानने में भी आपद्दि की है।सवाालङ्काररूपा स्कवीकार करने वाले –

उिवेतावलङ्कायौ तयोः पुनरलङ्कृवतः। वक्रोष्ठिरेव वैदग्ध्यिङ्गीिलर्वतरुच्यते॥2

राजशेखर ने वक्रेष्ट्ि का ननरूपण नही वकया वकन्तु काकु लजसे अलङ्काररको ने वक्रोष्ट्ि का एक भेद माना है और उसे ही अलङ्कार कहा है, न वक अलङ्कार।

काकु वक्रोष्ठि नाम शब्दालङ्कारोऽयम् इवत रूद्रटः3

अभिप्रायवान् पाठधमणः काकुः स कर्म् अलङ्कारः स्यात् इवत यायावरीयः4

पररहासपेशलेन वक्रोष्ट्ि ननपुणनेन राव्यायीकारव्यानपररचयचतुरेण सवाललवपज्ञेन एषावप बुद्ध यत् एवैतावती वक्रोिौ इयमवप जानत्कयेव पररहास जद्दपपतानन |

काणे के अनुसार यहााँ वक्रोष्ट्ि का प्रयोग क्रीडालाप पररहास, जद्दपपत के अथा में है।

सैषा सवेव वक्रोष्ठिरन्यार्ो वविाव्यते।

यत्तन्येवास्याम् कववना कायाण कोऽलङ्कारोऽन्या ववना ॥5

काव्यशाष्ट्ियों में भी दण्डी ने स्कवाभावोष्ट्ि को तथा भोज ने स्कवाभावोष्ट्ि तथा रसोष्ट्ि दोनों को इसके क्षेत्र से पृथक् रखा है।वक्रोष्ट्ि को केवल अलङ्कार के रूप में ग्रहण करने वाले आचायों में मतभेद है-

वकसी ने इसकी गणना शब्दालङ्कारों में की है तो वकसी ने अथाालङ्कारों में भामह ने वक्रोष्ट्ि का सवाालङ्कार रूपों में स्कवीकार अवश्य वकया है। वकन्तु वक्रोष्ट्ि की स्कथापना उतने सुदृढ रूप मे नही की लजतने सुदृढ रूप में कुन्तक ने की है। कुन्तक ने वक्रोष्ट्ि को एक मात्र अलङ्कार कहकर समस्कत काव्यसौनेरेय का अन्तभााव वक्रोष्ट्ि में ही कर ललया है। आचाया कुन्तक के अनुसार विोष्ट्ि का अनभप्राय है प्रलसद्ध अनभधान का अवतक्रमण करने वाली सहृदय आह्लादकाररणी वैदग्ध की शोभा से युि भलणवत। प्रलसद्दि का अथा है शािावद तथा लोक व्यवहार में प्रयुि इसप्रकार वक्रोष्ट्ि शािावद में उपननबद्ध शब्दाथासम्बन्ध तथा प्रचललत व्यवहार सरणी का अवतक्रमण करने वाली है। एतादृशी वक्रोष्ट्ि का प्रयोग

1.भिन्नां द्विधा स्विावोष्ठि वक्रोष्ठि चेवत वाङ्गमयां6

2.वक्रोष्ठिश्च रसोष्ठिश्च स्विावोष्ठिश्च वाङ्गमयां7

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4.वामन ,जयदेव , ववद्याधर, ववद्यानार्, रूय्यक, तर्ा अप्पय दीद्वित ने अर्ाणलङ्कारों में वक्रेष्ठि वक घर्ना की है।

5.वक्रोष्ठि प्रलसद्ध अभिधान व्यवतरेवकर्ीववभचत्रावाभिधा।कीदृशी वैदग्धधिांगीिलर्वत वैदग्धधां वववदग्धधिवः कववकमणकौशलां तस्य िङ्गीववद्वच्िद्वत्तः तया िलर्वत।

6.क-वक्रो यो असौ शास्त्रावद प्रलसद्ध शब्दार्ोपभनबन्धव्यतरेकी ।

- वक्रभावा प्रलसद्धप्रस्कथानव्यवतरेकीवैनचत्र्यं वववदग्धद्वारा वह सम्भव है। केवल शािज्ञ द्वारा नही इसीकारण कुन्तक ने वक्रोष्ट्ि को वैदग्धभङ्गीभलणवत कहा है। काव्य में यह वैदग्धभङ्गीभलणवत कवव कमा के आलित रहती है। वक्रोष्ट्ि के ललए लोक और शाि में प्रयुि शब्द अथा के उपननबन्धन से नभन्न होना तथा कववकौशल पर आलित होना वह पयााप्त नही है अवपतु उसमें सहृदय के मनः प्रसादन की क्षमता होना अननवाया है। इस वद्दक्ि के 6 प्रकार

हैं-1.वर्णववन्यासवक्रता

2.पदपूवाणधणवक्रता

3.दपदाधणवक्रता

4.वाक्यवक्रता

5.प्रकरर्वक्रता

6.प्रबन्धवक्रता

वक्रोष्ट्ि के इन 6 भेदों में कुन्तक ने काव्यसौन्दया का अन्तभााव कर ललया है। यह वक्रोष्ट्ि काव्य के सूक्ष्मतम अङ्ग वणाववन्यास से लेकर स्कथूलतम अङ्ग प्रबन्ध में भी प्राप्त होती है।

वर्णववन्यासवक्रता

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संयोजना वणाववन्यासवक्रता कहलाती है। कुन्तक वक वणाववन्यास वक्रता का मुख्याधार है व्यञ्जनों वक आवृद्दि । यह आवृद्दि दो प्रकार वक हो सकती है। प्रथम लजसमें वणों वक आवृद्दि का स्कथान ननयत न हो तथा द्दद्वतीय लजसमें वणों वक आवृद्दि का स्कथान ननयत हो । इसी आधार पर कुन्तक ने वणाववन्यासवक्रता के दो भेद वकए हैं। प्रथम को उन्होने अनुप्रास का द्दद्वतीय को यमक का पयााय बताया है।अननयत स्कथानवृद्दि रूप वणाववन्यासवक्रता तथा अनभज्ञानशाकुन्तलं में उसका प्रयोग- अननयतस्कथानवृद्दि रूप वणाववन्यासवक्रता ३ प्रकार वक होती है।

1.प्रथम प्रकार एक दो अथवा अनेक वणों वक स्कवपपानन्तर से आवृद्दि इसके भी तीन भेद होते हैं।एक वणा वक अनेकधा

आवृद्दि-एको िौ बहवो वर्ाणः बद्धमाना पुनः पुनः । स्वल्पानन्तरष्ठस्त्रधा सोिा वर्णववन्यासवक्रता॥8

येयं वणाववन्यासवक्रता नाम वाचकाऽलङ्कृवतः स्कथानननयमाभावात् सकलवाक्यस्कय ववषयत्कवेन समाम्नाता सैव प्रकारान्तरववलशरा ननयतस्कथआन तयोपननबद्धमाना वकमवप वैनचत्र्यान्तरमानबाधजावतव्याह। (वक्रोष्ट्िजीववतम् पेज-188.)

2.एतददेववणाववन्यासवक्रतं नचरन्तनेष्वनुप्रासेवत प्रलसद्धं। यमकनाम कोऽप्यस्कयाः प्रकारः पररदृश्यते । वणाानां ववन्यासो वणाववन्यासः अक्षराणां ववलशरन्यसनं तस्कय वक्रत्कवं वक्रभावः प्रलसद्धप्रस्कथानावतरेवकणा वैनचत्र्योपननबन्धा सद्दन्नवेशः ववशेषवववहत तस्कय तद्दद्वदाह्लादकाररणी शब्दशोभावतशयः ।

3.वणाशब्दोऽत्र व्यञ्जनपयााय तथा प्रलसद्धत्कवात्

अनभज्ञानशाकुन्तले-क- स्वप्नो नु माया नु मवतभ्रमो नु, ष्ठिष्टां नु तावत्फलमेव पुण्यम्। असद्वन्नवृत्यै तदतीतमेते, मनोरर्ा नाम तटप्रपातः॥9

यहां प्रथम चरण में म और न वक तृतीय चरण में भी म और न वक आवृद्दि है।

ख- अनेक वणों वक अनेकधा आवृद्दि

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प्रथ चरण में त, स और र तथा द्दद्वतीय चरण में द, य और म वणों वक अनेकधा आवृद्दि है।

द्वितीयप्रकार – इसके भी दो भेद है।

क- अपने वणा के अद्दन्तम वणा से युि अद्दन्तम स्कपशा वणा वक आवृद्दि –

शक्यमरववन्दसुरभिः कर्वाही माललनीतरङ्गार्ानाम्। अङ्गैरनङ्गतप्तैरववरलमाललभनष्ठङ्गांतु पवनः ॥11

यहां अपने वणा वक अद्दन्तम वणा ङ से युि स्कपशा वणा ग वक आवृद्दि है। अन्य द्ररव्य स्कथल

अनभज्ञानशाकुन्तलं-िवद्वन्त नम्रास्तरवः फलागमैः, नवाम्बुभिददणरववलद्वम्बनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्वद्धभिः, स्विाव एवैष परोपकाररर्ाम्॥12

काद्वन्तयोभगनः स्पशणः द्विरुिास्तलनादयः। लशष्टा स च रावदसांयुिः प्रस्तुतो भचत्यशोभिनः॥13

ख-द्दद्वरोि त, ल, न आवद की आवृद्दि

मय्येव ववस्मरर्दारुर्भचत्तवृत्तौ, वृत्तां रहः प्रर्यमप्रवतपद्यमाने । िेदात् भ्रूवोः कुवटलयोरवतलोवहताक्ष्या,

ििां शरासनभमवावतरुषास्मरस्य॥14

यहााँ द्दद्वरुिता में त वक आवृद्दि है।

ग- वगाान्तयुि स्कपशा वणों तथा तकार, लकार, नकार आवद से नभन्न शेष व्यञ्जन य, र, ल, व, श, स, ष, ह वक रेिावद से युि संयुि रूप में आवृद्दि है।

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तृतीय प्रकार- प्रथम द्दद्वतीय प्रकारों में स्कवपपानन्तर से वणों वक आवृद्दि का ववधन वकया गया है वकतु कहीं कहीं पर व्यवधान न होने पर भी स्कवरों वक ववषमता होने पर समान वणों के ग्रलथत होने से रचना में मनोहारता आ जाती है। यही कुन्तक वक अननयतस्कथान वृद्दिरूपवणाववन्यासवक्रता का तृतीय प्रकार है।

उदा-मय्येव ववस्मरर्दारुर्भचत्तवृत्तौ, वृत्तां रहः प्रर्यमप्रवतपद्यमाने । िेदात् भ्रूवोः कुवटलयोरवतलोवहताक्ष्या,

ििां शरासनभमवावतरुषा स्मरस्य॥15

क्वभचद् व्यवधानेऽवप भनबन्धना । स स्वरर्ाां सारूप्यात् पराां पुष्नावत वक्रताां॥16

एक दो अथवा अनेक वणों वक उसी क्रम में आवृद्दि को इसी तृतीय वणाववन्यासवक्रता के अन्तगात माना है, अत एव कहा जा सकता है वक (व्यधान रवहत अथवा व्यवधान सवहत एक दो अथवा अनेक वणों वक उसी क्रम में आवृद्दि तृतीय प्रकार वक अननयत स्कथान वृद्दिरूप वणा ववन्यासवक्रता है)।

सव्यवधान और अव्यवधाना इन दोनों भेदों से युि इस वणाववन्यासवक्रता से सुशोनभत वाक्यरचना उसी प्रकार सहृदयाह्लादकाररणी होती है, लजसप्रकार मोवतयों के हार के मध्य अनुस्कयूत मलण नननमात पदक रमणीय होते हैं।

क- ईषदीषच्चुद्वम्बताभन भ्रमरैः सुकुमारकेसरलशखाभन। अवतांसयद्वन्त दयमानाः प्रमदाः लशरीषकुषुमाभन॥17

यहां च्चु में एक वणा च वक व्यवधानरवहत आवृद्दि है।

ख- व्यवधान सवहत एक दो अथवा अनेक वणों वक उसी क्रम में आवृद्दि –

कृतां न कर्ाणवपणतबन्धनां सखे, लशरीषनमागण्डववलद्वम्बकेसरम्।

न वा शरच्चन्द्रमरीभचकोमलां, मृर्ालसूिां रभचतां स्तनान्तरे॥18

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ननयतस्कथानवृद्दिरूपवणाववन्यासवक्रता तथा अनभज्ञानशाकुन्तलं में उसका प्रयोग- इस वणाववन्यासवक्रता में कुन्तक ने यमक अलङ्कार को समावहत कर ललया है। उन्होने कहा है वक इस वणाववन्यासवक्रता को नभन्न अथा वाले समान वणों से युि प्रसाद गुण से समद्दन्वत िुवत रमणीय औनचत्कयपूणा तथा आवद मध्य और अन्त इत्कयावद ननयत स्कथानों पर सुशोनभत होने वाला यमक नाम का अपूवा भेद दृष्ट्रगोचर होता है। कुन्तक ने वणाववन्यासवक्रता के रूप में यमक को स्कवीकार वकया है। पूवााचायों के समान यमक के भेद प्रभेदों के झाड झंखार में िसना नही चाहते थे। वणाववन्यासवक्रता से नभन्न वकसी अन्य शोभा का अभाव होने के कारण यमक का अनधक ववस्कतार नही वकया गया ह। उदा-

प्रजाः प्रजाः स्वा इव तन्त्रभयत्वा, भनषेवते श्रान्तमना वववविम्।

यूर्ाभन सांचायण रववप्रतप्तः, शीतां वदवा स्र्ानभमव द्विपेन्द्रः॥19

यहााँ प्रजा प्रजा नभन्न अथा वाले समान वणों से युि हैं, अतः यहााँ ननयतस्कथानवृद्दिरूपवणाववन्यासवक्रता है।

सन्दिणग्रन्र्सूची-1.मद्दिनाथ(अनभज्ञानशाकुन्तलं भूनमका) 2.वक्रोष्ट्िजीववतम्-1.10

3.काव्यालङ्कार रूद्रट4.8 4.काव्यमीमांसा-7.7 5.काव्यादशा-2.363

6.सरस्कवतीकण्ठाभरणम्-5.8 7.वक्रोष्ट्िजीववतम्-2.1 8.अनभज्ञानशाकुन्तलम्-6.10 9.अनभज्ञानशाकुन्तलम्-3.3 10.अनभज्ञानशाकुन्तलम्-3.4 11.अनभज्ञानशाकुन्तलम्-5.12 12.वक्रोष्ट्िजीववतम्-2.2 13.अनभज्ञानशाकुन्तलम्-5.23 14.अनभज्ञानशाकुन्तलम्-5.23 15.काव्यादशा-1.25

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