© 2017 IJSRST | Volume 3 | Issue 8 | Print ISSN: 2395-6011 | Online ISSN: 2395-602X Themed Section: Science and Technology
काव्यभेदााः
शिवानन्द िुक्ल शवभागाध्यक्ष साशित्य,
श्री सच्चा अध्यात्म संस्कृत मिाशवद्यालय, अरैल, इलािाबाद।
सामान्य के ज्ञान के शबना शविेष की शिज्ञासा निीं िोता िै अताः काव्य के सामान्य स्वरूप को किने के पश्चात् शविेष स्वरूप काव्य भेद प्रशतपादन ककया िा रिा िै।
यिााँ भेद िब्द भेदनं भेदाः शवभागाः इस भाव व्यत्पशि से उिममध्यमाकद शवभाग परक िै, तथा शभद्यते अनेन इशत भेदाः इस करण व्युत्पशि से ध्वशन आकद शविेषलक्षण परक िै।
कुछ आलङ्काररक काव्य का शवभाग काव्य की बाह्य संरचना (स्वरूप) की दृशि से करते िैं तो कुछ आचायय काव्य के आत्मतत्त्व व्यङ््य के प्राधान्य अप्राधान्य की दृशि के करते िैं। काव्यात्म तत्त्व के प्राधान्याप्राधान्य से काव्य भेद प्रशतपाकदत करने वाले आचायैं में भी काव्य भेद के शवषय में एकरूपता निीं अताः प्रकृत सन्दभय में इस शवषय शवचार पर ककया िा रिा िै। इस प्रकार यकद काव्य शवभाग के सन्दभय में ध्वशनकार को मध्य में रखकर काव्य शवभाग ककया िाए तो िम यि कि सकते िैं कक ध्वशन से पूवय काव्य के शवभाग का मूल काव्य की संरचना भाषा आकद बाह्य तत्त्व िै िबकक ध्वशन स्थापना के पश्चात् प्रायाः सभी आचायों ने काव्य शवभाग में प्रथम भेद ध्वशन काव्य को माना िै।
१.३.१. पूवायचाययोोों का मत
1. आचायय भामि
-आचायय भामि काव्य का चार प्रकार से शवभाग करते िैं - छन्द की दृशि से, भाषा की दृशि से, प्रशतपाद्य शवषय की दृशि से तथा प्रकारान्तर से। प्रथमताः छन्द की दृशि से काव्य का शवभािन करते हुए किते िैं - "िब्दाथौ सशितौ काव्यं गद्यं पद्यं च तशिधा।'1 अथायत् गद्य तथा पद्य के भेद के काव्य दो प्रकार का िै। काव्य का यि शवभािन छन्द की दृशि से िै, कशव की छन्दरशित
रचना गद्य तथा छन्दोबद्ध रचना पद्य किलाती िै।
भाषा की दृशि से काव्य को आचायय भामि तीन प्रकार का बतलाते िैं-'संस्कृतं प्राकृतं चान्यदपभ्रंिशमशत शिधा।'2 अथायत्
संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंि के भेद से काव्य तीन का प्रकार का िोता िै। यि काव्य का शिशवध शवभािन भाषा की दृशि से िै,
संस्कृत भाषा में शनबद्ध काव्य, प्राकृत भाषा में शनबद्ध काव्य तथा अपभ्रंिाशधक्य काव्य। पुनाः आचायय प्रशतपाद्य शवषय के आधार पर काव्य का शवभाग प्रशतपाकदत करते िैं
-वृिवेदाकदचररतािंशस चोत्पाद्यवस्तु च। कलािास्त्राश्रयं चेशत चतुधाय शभद्यते पुनाः॥3
अथायत् वृिवेदाकदचररतािंशस, उत्पाद्यवस्तु, कलाश्रय एवं िास्त्राश्रय के भेद से काव्य चार प्रकार का िै। काव्य का यि शवभािन प्रशतपाद्य शवषय की दृशि से िै।
आचायय प्रकारान्तर से पुनाः काव्य को पााँच प्रकार का किते िैं
-सगयबन्धोऽशभनेयाथयाः तथैवाख्याशयकाकथे। अशनबद्धञ्च काव्याकद तत्पुनाः पञ्चधोच्यते॥4
अथायत् सगयबन्ध (मिाकाव्य), अशभनेयाथय (रूपक), आख्याशयका (गद्यभेद), कथा (गद्यभेद) तथा अशनबद्ध (मुक्तक) के भेद से काव्य का शवभािन करते िैं।
आचायय के िारा प्रशतपाकदत सभी दृशियों से प्रशतपाकदत काव्य के भेद काव्य के बाह्यपक्ष को दृशि में रखकर ककए गए िैं अन्तस् तत्त्व के ध्यान में रखकर निीं।
2. आचायय दण्डी –
आचायय दण्डी प्रथमताः छन्द की दृशि से काव्य के तीन शवभाग प्रदर्ियत करते िैं
-गद्यं पद्यञ्च शमश्रञ्च तशत्िधेशत व्यवशस्थतम्।5
अथायत् गद्य पद्य तथा शमश्र भेद से काव्य तीन प्रकार का िै। पुनाः आचायय दण्डी काव्य के गद्य पद्य तथा शमश्र के भेदों के प्रभेदों को किते िैं
-अपादाः पदसन्तानो गद्यमाख्याशयका कथा। इशत तस्य प्रभेदौ िौ ...॥6
अथायत् अपाद पदसन्तान गद्य किलाता िै और यि गद्य कथा तथा आख्याशयका के भेद से दो प्रकार का िोता िै।
मुक्तक, कुलक, कोिाकद यद्यशप पद्य काव्य के शवशवध भेद िैं तो भी सभी पद्य काव्य सगयबन्ध िोते िैं इसशलए पद्य काव्य के भेद का शवस्तार निीं ककया गया िै।7
शमश्र काव्य नाटकाकद िैं तथा गद्यपद्यमयी रचना चम्पू किलाती िै
-शमश्राशण नाटकादीशन तेषामन्यि शवस्तराः। गद्यपद्यमयी काशचच्चम्पूररत्यशभधीयते॥8
भाषा के आधार पर आचायय दण्डी काव्य के चार भेद किते िै
-तदेतिाङ्मयं भूयस्संस्कृतं प्राकृतं तथा। अपभ्रंिश्च शमश्रं चेत्याहुराचायायश्चतुर्वयधम्॥9
अथायत् संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंि तथा शमश्र के भेद से भाषा के आधार पर काव्य के चार भेद िैं। भाषा की दृशि से काव्य भेदों का आचायय समन्वय स्थाशपत करते िैं। सगयबन्धाकद काव्य संस्कृत भाषा में, स्कन्धाकद काव्य प्राकृत भाषा में, ओसराकद काव्य अपभ्रंि तथा नाटकाकद काव्य शमश्र भाषा में शनबद्ध िैं। कथा सभी भाषाओं में शनबद्ध िोती िै।
4काव्यलङ्कार पृ॰ 7। 5काव्यदिय भाग 1 पृ॰ 14। 6काव्यदिय भाग 1 पृ॰ 24।
7मुक्तकं कुलकं कोिाः सङ्घात इशत तादृिाः।
सगयबन्धांिरूपत्वादनुक्ताः पद्य शवस्तराः॥ (काव्यदिय भाग 1 पृ॰ 15)
संस्कृतं सगयबन्धाकद, प्राकृतं स्कन्धकाकद यत्। ओसराकदरप्रभ्रंिो नाटकाकद तु शमश्रकम्॥ कथा शि सवयभाषाशभाः संस्कृतेन च बध्यते।10
आचायय दण्डी िारा प्रशतपाकदक यि काव्य शवभाग भी बाह्य तत्त्व पर आधाररत िी िै।
3. आचायय वामन
-आचायय वामन प्रथमताः काव्य के दो भेद किते िैं - गद्य तथा पद्य।11 पुनाः गद्य काव्य के तीन भेद12- वृशिगशन्ध,13 चूणयम्,14 तथा उत्कशलकाप्रायम्।15 पुनाः पद्य का शवभाग गणना के शबना पद्य के अनेक भेद िैं16 यि किकर किते िैं।
पुनाः आचायय वामन गद्य पद्य उभय साधारण काव्य अशनबद्ध एवं शनबद्ध भेद से दो प्रकार का किते िैं
-तदशनबद्धं शनबद्धञ्च।17
इस प्रकार काव्य शवभाग प्रशतपादन में आचायय प्रथमताः गद्य एवं पद्य भेद से काव्य को दो प्रकार का प्रशतपाकदत कर पूवायचायय प्रशतपाकदत छन्दमूलक शवभाग की दृशि का समथयन करते िैं, परन्तु गद्य भेद प्रशतपादन में आचायय रीशत का आश्रय लेते िैं।
4. ध्वशनकार आचायय आनन्दवधयन
-आचायय आनन्दवधयन काव्य के शवभाग में सवयप्रथम व्यङ््य को भेदक तत्त्व के रूप में प्रशतपाकदत करते िैं। -आचायय के मत में सवयथा व्यङ््याथय छन्दोबद्ध िब्द योिना माि को काव्य निीं किा िा सकता। अताः आचायय के काव्य भेद को िम शनम्न प्रकार से स्पि कर सकते िैं। प्रथमताः आचायय के मत में काव्य भेद की दो दृशियााँ प्रतीत िोती िैं। रसभावाकदतात्पययशववक्षा सशित,
रसभावाकदतात्पययशववक्षा रशित। यि रसभावाकदतात्पययशववक्षा सशित काव्य दो प्रकार का िै- एक वि शिसमें वाच्याथय की अपेक्षा व्यङ््याथय का प्राधान्य िो, शितीय भेद वि शिसमें व्यङ््याथय के चमत्कार से चमत्कृत वाच्याथय का प्राधान्य िो। प्रथम भेद ध्वशनकाव्य तथा शितीय भेद गुणीभूतव्यङ््य काव्य किलाता िै।18 ये दोनों िी काव्य भेद व्यङ््याथय के प्राधान्य तथा अप्राधान्य से िैं।
रसभावाकदतात्पययशववक्षारशित गुणालङ्कारप्राधान्य में काव्य का एक िी भेद िै, शिसे शचि काव्य किते िैं।19 यिााँ व्यङ््याथय तो िोता िै परन्तु वि व्यङ््याथय कशव शववक्षा शवरशित िी िोता िै।
10 (काव्यदिय भाग 1 पृ॰ 33-34)
11काव्यं गद्यं च पद्यञ्च। (काव्यालङ्कारसूि 1.3.21, पृ॰ 37)
12गद्यं वृशिगशन्ध चूणयमुत्कशलकाप्रायञ्च। (काव्यालङ्कारसूि 1.3.22, पृ॰ 38) 13अदीघयसमासम्, अनुद्धतपदवत्समासञ्च।
14अनाशबद्धलशलतपदं चूणयम्। (काव्यालङ्कारसूि 1.3.24, पृ॰ 38) 15 शवपरीतमुत्कशलकाप्रायम् (काव्यालङ्कारसूि 1.3.25, पृ॰ 38) 16 पद्यमनेकभेदम्। (काव्यालङ्कारसूि 1.3.26)
17(काव्यालङ्कारसूि 1.3.27)
18प्रधानगुणभावाभयां व्यङ््यस्यैवं व्यवशस्थते।
काव्ये उभे ततोऽन्यद्यिशच्चिमशभधीयते॥ (ध्वन्यालोक पृ॰ 494) 19रसभावाकदतात्पययशववक्षाशवरिे सशत।
यि शचि काव्य भी पुनाः िब्दाथय के भेद से दो प्रकार का िै- िब्दशचि एवं वाच्यशचि।20 इस प्रकार ध्वशनकार आचायय आनन्दवधयन के मत में साकल्येन काव्य तीन प्रकार का िै - ध्वशनकाव्य, गुणीभूतव्यङ््यकाव्य तथा शचिकाव्य।
आचायय के िारा प्रशतपाकदत काव्य भेद में शचि काव्य का अकाव्यत्व प्रशतपादन िैसा यद्यशप प्रतीत िोता िै21 तो भी आचायय शचिकाव्य को काव्य का तृतीय भेद स्वीकार करते िैं।22
5. आचायय मम्मटभट्ट
-आचायय मम्मट व्यङ््याथय की दृशि से काव्य के तीन शवभाग किते िैं- उिम, मध्यम तथा अधम। ििााँ वाच्याथय की अपेक्षा व्यङ््याथय अशतिय चमत्कारकारी िो वि उिम काव्य िै
-इदमुिममशतिाशयशनव्यङ््ये वाच्याद् ध्वशनाः बुधैाः कशथताः।23
ििााँ वाच्याथय की अपेक्षा व्यङ््याथय अनशतिायी िो वि शितीय गुणीभूतव्यङ््य काव्य मध्यम काव्य किलाता िै।
-अतादृशिगुणीभूतव्यङ््यं व्यङ््ये तु मध्यमम्।24
पुनाः ििााँ व्यङ््याथय कशव का तात्पयय न िो ऐसा गुणालङ्कार प्रधान25 काव्य का तृतीय भेद अधम काव्य शचि काव्य किलाता िै। यि शचि काव्य िब्द तथा अथय के भेद दो प्रकार का िै िब्द शचि तथा अथय शचि।
िब्दशचिं वाच्यशचिमव्यङ््यं त्ववरं स्मृतम्।26
आचायय मम्मट गुणों का आधार रस को प्रशतपाकदक करते िैं,27 और रस सदैव व्यङ््य िी िोता िै।28 इस प्रकार शचि काव्य में व्यङ््य का अभाव िोने से रस का भी अभाव िोगा िी। ऐसी दिा में ििााँ रस का अभाव िोगा विााँ गुण का सद्भाव कैसे सम्भव िै। यकद आधार िी निीं िोगा तो आधेय कैसे िो सकता िै।
इसका समाधान यि िै कक यिााँ अव्यङ््य पद का अशभप्राय व्यङ््य रशित निीं अशपतु कशवशववक्षा रशित िै। आचायय िारा प्रदि अधम काव्य के उदािरण स्वच्छन्दोच्छल... इत्याकद पद में कशवशनष्ठ भगवशिषयक रशत व्यङ््य िै िी, परन्तु यिााँ व्यङ््य में कशव का तात्पयय न िोकर अलङ्कार योिना माि में कशव की दृशि िै।
6. शवद्यानाथ
-आचायय शवद्यानाथ भी व्यङ््य के प्राधान्य, अप्राधान्य एवं अस्फुटत्व से काव्य के उिम, मध्यम तथा अधम तीन भेद प्रशतपाकदत करते िैं-
व्यङ््यस्य प्राधान्याप्राधान्यास्फुटत्वेन च शिशवधं काव्यम्।29
20शचिं िब्दाथयभेदेन शिशवधं च व्यवशस्थतम्।
ति ककशञ्चच्छब्दशचिं वाच्यशचिमताः परम्॥ (ध्वन्यालोक पृ॰ 494) 21व्यङ््यैवं व्यवशस्थते काव्ये उभे ततोऽन्यद्यिशच्चिशमत्यशभधीयते।
22एतशच्चिं कवीनां शवश्रृङ्खलशगरां रसाकदतात्पययमनपेक्ष्यैव काव्यप्रवृशिदियनादस्माशभाः पररकशल्पतम्। (ध्वन्यालोक पृ॰ 497) 23काव्यप्रकाि प्रथम उल्लास
24काव्यप्रकाि प्रथम उल्लास
25शचिशमशत गुणालङ्कारयुक्तम्। (काव्य प्रकाि प्रथम उल्लास) 26काव्य प्रकाि प्रथम उल्लास।
27ये रसस्याशङ्गनो धमायाः िौयायदय इवात्मनाः। (काव्य प्रकाि अिम उल्लास) 28रसाः स्वप्नेऽशप न वाच्याः।
आचायय काव्य के तृतीय भेद शचि के ती भेद बतलाते िैं - िब्दशचि, वाच्यशचश्र तथा उभयशचि।
पूवायचायों की भााँशत आचायय भी व्यङ््य के प्राधान्य अप्राधान्य तथा अस्फुटत्व से काव्य शवभाग प्रशतपाकदत करते िैं। यि शचि काव्य का शिशवध शवभािन िी शवद्यानाथ के काव्य शवभािन में शविेष िै।
7. आचायय शवश्वनाथ कशवराि
-आचायय शवश्वनाथ कशवराि व्यङ््य के प्राधान्याप्राधान्य की दृशि से काव्य दो शवभाग - ध्वशनकाव्य तथा गुणीभूतव्यङ््य काव्य प्रशतपाकदत करते िैं।
ध्वशनगुयणीभूतव्यङ््यं चेशत शिधा मतम्।30
आचायय शवश्वनाथ पूवायचायय प्रशतपाकदत काव्य के तृतीय भेद शचि काव्य का खण्डन करते िैं। आचायय का किना िै कक शचि काव्य के लक्षण घटक अव्यङ््य का अथय यकद व्यङ््याथय का अभाव िै तो व्यङ््याथय के अभाव में शचि काव्य को काव्य िी निीं किा िा सकता। यकद अव्यङ््य पद का अथय ईषद् व्यङ््य किा िाए तो ईषद् व्यङ््य का क्या स्वरूप िोगा। यि ईषद् व्यङ््य आस्वाद्य िोगा या अनास्वाद्य। यकद यि आस्वाद्य व्यङ््य िै तो पूवोक्त दो भेदों में िी शचि काव्य का समावेि क्यों निीं ?
और यकद यि ईषद् व्यङ््य अनास्वाद्य तो पूवायचायय प्रशतपाकदत काव्य यि भेद अकाव्य िी िोगा। आचायय शवश्वनाथ पूवायचायय प्रशतपाकद काव्य के तृतीय भेद शचि काव्य के खण्डन मे प्रमाण रूप में ध्वशनकार आचायय आनन्दवधयन को भी उद्धृत करते िैं
-प्रधानगुणभावाभयां व्यङ््यस्यैवं व्यवशस्थते। काव्य उभे ततोऽन्यद्यिशचिमशभधीयते॥31
इस प्रकार आचायय शवश्वनाथ के मत में व्यङ््य की दृशि काव्य के दो िी भेद िैं - ध्वशनकाव्य तथा गुणीभूत व्यङ््य काव्य।
पुनाः आचायय दृश्य एवं श्रव्य के भेद से काव्य का शिशवध शवभािन प्रशतपाकदत करते िैं। दृश्यश्रव्यत्वभेदेन पुनाः काव्यं शिधा मतम्।32
आचायय कणयपूरगोस्वामी
-आचायय कशवकणयपूर भी उिम, मध्यम तथा अधम भेद के काव्य का शिशवध शवभाग प्रशतपाकदत करते िैं।
-उिमं ध्वशनवैशिष्ट्ये मध्यमे ति मध्यमम्। अवरं ति शनष्ट्पन्दाः इशत शिशवधमाकदताः॥33
पुनाः अवर काव्य के िब्दाथय भेद दो शवभाग प्रशतपाकदत ककए िैं। िब्दाथययोश्च वैशचत्र्ये िे याताः पूवयपूवयताम्।34
इस प्रकार काव्य का शिशवध भेद प्रशतपाकदत कर आचायय उिमोिम नाम का ध्वशनकाव्य का प्रभेद प्रशतपाकदत करते िैं।35
30साशित्यदपयण पृ॰ 206। 31ध्वन्यालोक।
आचायय पशण्डतराि िगन्नाथ –
आचायय ने सवयप्रथम नूतन दृशि का आश्रय ले कर चमत्कार के आधार पर काव्य का शवभाग प्रशतपाकदत ककया िै
-उिमोिम, उिम, मध्यम तथा अधम। आचायय के मत में चमत्कार की तीन श्रेशणयााँ िैं- व्यङ््य चमत्कार, वाच्यचमत्कार तथा िब्दचमत्कार। व्यङ््य चमत्कार के प्राधान्य एवं अप्राधान्य से काव्य के दो भेद- उिमोिम तथा उिम। पुनाः वाच्य चमत्कार का काव्य का तृतीय भेद मध्यम अन्त में वाच्यचमत्कारोपस्कृत िब्द के चमत्कार में काव्य चतुथय भेद अवर काव्य।
आचायय मम्मट प्रशतपाकदत काव्य भेद में व्यङ््य के सद्भाव एवं असद्भाव को आधार पर काव्य भेद प्रशतपाकदत िै, ऐसी दिा में व्यङ््य सद्भाव की दिा काव्य के दो भेद उिम ध्वशन काव्य तथा मध्यम गुणीभूत व्यङ््य काव्य। आचायय प्रशतपाकदत व्यङ््य की दृशि से काव्य के दो भेद उशचत प्रतीत िोते िैं परन्तु काव्य का तृतीय भेद व्यङ््याथय में कशव का तात्पयय न िो गुणालङ्कार शवशिि रचना में कशव का तात्पयय िो विााँ अतात्पययभूत व्यङ््य वस्तुताः शवद्यमान िोते हुए भी अशवद्यमानकल्प िी िै अताः तृतीय भेद को भी व्यङ््य की दृशि से किना उशचत प्रतीत निीं िोता िै। अताः ििााँ वाच्य अथवा िब्द कृत चमत्कार िो वे भेद वाच्य अथवा िब्द से िी माने िाएाँ, इनका शवभािन व्यङ््य के आधार पर मानना उशचत प्रतीत निीं िोता िै। इसशलए आचायय पशण्डतराि िगन्नाथ ने चमत्कार को काव्य का भेदक तत्त्व प्रशतपाकदत ककया िै।
1. उिमोिम काव्य
-आचायय पशण्डतराि प्रथम उिमोिम काव्य का लक्षण किते िैं
-िब्दाथौ यि गुणीभाशवतात्मानौ कमप्यथयमशभव्यङ्क्तस्तदाद्यम्।36
ििााँ िब्द एवं अथय अपने को गौण बनाकर उस चमत्कारकारी प्रतीयमान अथय को व्यञ्जनावृशि से किते िैं वि प्रथम उिमोिम काव्य किलाता िै।
यकद लक्षण में अथय का शविेषण कमशप निीं कदया िाता तो अशतगूढ व्यङ््य तथा स्फुट व्यङ््य में लक्षण की अशतव्याशि िोती।37 अपराङ्गव्यङ््य तथा वाच्यशसद्ध्यङ्ग व्यङ््य भी चमत्कारकारी तो िोते िैं अताः इनमें अशतव्याशि वारण के शलए गुणीभाशवतात्मानौ पद का समावेि लक्षण में ककया गया िै।38
न िी अशतगूढ और न िी अशतस्फुट व्यङ््य चमत्कार को उत्पन्न करता िै। काशमनीकुचकलि के समान व्यङ््य िी चमत्कार को उत्पन्न करता िै।
अपराङ्गव्यङ््य तथा वाच्यशसद्ध्यङ्ग व्यङ््य में शितना चमत्कार िोता िै उतना अशतगूढ स्फुट व्यङ््य में निीं। अस्फुट एवं अगूढ व्यङ््य िो गुणीभूतव्यङ््य के प्रभेद िैं इनका शनरास करने के शलए लक्षण में कमशप पद का उपादान ककया गया िै। अपराङ्गव्यङ््य एवं वाच्यशसद्ध्यङ्ग व्यङ््य दोनों िी गुणीभूतव्यङ््य प्रभेदों में वाच्य का प्राधान्य िोता िै एवं व्यङ््य भी चमत्कारकारी रोता िै। अताः व्यङ््य के वाच्य के अपेक्षा अप्रधान िोते हुए चमत्कारकारी िोने से इन काव्यों में अशतव्याशि वारण के शलए गुणीभाशवतात्मानौ इस पद का लक्षण में समावेि ककया गया िै।
आचायय कृत यि काव्य लक्षण ध्वशनकार के िारा प्रशतपाकदत ध्वशन के लक्षण से साम्य रखता िै -
यिाथयाः िब्दो वा तमथयमुपसियनीकृतस्वाथौ।
व्यङ्क्ताः काव्यशविेषाः स ध्वशनररशत सूररशभाः कशथताः॥39
36रसगङ्गाधर प्रथम आनन पृ॰ 37।
37कमपीशत-चमत्कृशतभूशमम्, तेनाशतगूढस्फुटव्यङ््ययोर्नयरासाः। (रसगङ्गाधर प्रथम आनन पृ॰ 37।
38अपराङ्गवाच्यशसद्ध्यङ्गव्यङ््यस्याशप चमत्काररतया तिारणाय-गुणीभाशवतात्मानाशवशत स्वापेक्षया व्यङ््यप्राधान्याशभप्रायम्। (रसगङ्गाधर प्रथम आनन पृ॰ 37)
प्रकृत ध्वशन लक्षण में वा पद प्राधान्य के अशभप्राय से शवकल्पाथयक40 िै। अथायत् अशववशक्षत वाच्यध्वशन में िब्द व्यञ्जक िोता िै और अथय सिकारी तथा शववशक्षतान्यपरवाच्यध्वशन में अथय व्यञ्जक िोता िै और िब्द सिकारी। इसी अशभप्राय से अथयाः िब्दाः वा किा गया िै।41
व्यङ्क्ताः में शिवचनानुपपशि
-अशववशक्षतवाच्यध्वशन में अथय सिकृत िब्द का प्राधान्य िै इस प्रकार िब्द उस चमत्कारकारी अथय को व्यक्त करता िै। इसी प्रकार शववशक्षतान्यपरवाच्यध्वशन में िब्द सिकृत अथय का प्राधान्य िै, अताः अथय उस चमत्कारकारी अथय को व्यक्त करता िै। इसप्रकार गुणशवशिि प्रधान िी प्रतीयमान अथय को व्यक्त करता िै और उस प्रधान के एकवचनान्त िोने से शिवचनान्त व्यङ्क्ताः पद की सङ्गशत करना शक्लि प्रतीत िोता िै।
यकद िम ककसी प्रकार व्यङ्क्ताः में शिवचन का समथयन करें भी तो चैि के सिकार से मैि तथा मैि के सिकार से चैि के गमन को किने के शलए चैिाः मैिाः वा गच्छताः यि प्रयोग कोई निीं करता। अताः ध्वशनलक्षण में शिवचन का समथयन अतीव शक्लि िी प्रतीत िोता िै।
आचायय उिमोिम काव्य के तीन उदािरण देते िैं
-िशयता सशवधेऽप्यनीश्वरा सफलीकतुयमिोमनोरथान्। दशयता दशयताननाम्बुिं दरमीलन्नयना शनरीक्षते॥42 यि रसध्वशन का उदािरण िै।
शितीय उदािरण
-गुरुमध्यगता मया नताङ्गी शनिता नीरिकोकरेण मन्दम्। दरकुण्डलताण्डवं नतभ्रूलशतकं मामवलोक्य घूर्णयताऽऽसीत्॥43 यि भावध्वशन का उदािरण िै।
तृतीय उदािरण
-तल्पगताशप च सुतनुाः श्वासासङ्गं न या सेिे। सम्प्रशत सा हृदयगतं शप्रयपाणणं मन्दमाशक्षपशत॥44 यि संलक्ष्यक्रम के रशतध्वशन का उदािरण िै।
इसके अनन्तर आचायय मम्मट के िारा ध्वशनकाव्य के कदए गए उदािरण की अप्पय्यदीशक्षत कृत व्याख्या की पशण्डतराि ने समीक्षा की िै।
2. उिम काव्य
-उिमोिम काव्य का लक्षण तथा उदािरण किने के पश्चात् आचायय उिम काव्य का लक्षण किते िैं। यि व्यङ््यमप्रधानमेव सच्चमत्कारकारणं तशितीयम्।45
40गिायसमुच्चयप्रश्निङ्कासम्भावनास्वशप।
उपमायां शवकल्पे वा साशम त्वधे िुगुशप्सते॥ (अमरकोि)
41यद्यप्यशववशक्षतवाच्ये िब्दे एव व्यञ्जकस्तथाप्यथयस्याशप सिकाररता न िुटयशत, अन्यथा अज्ञाताथोऽशप िब्दस्तद्व्यञ्जस्स्यात्। शववशक्षतान्यपरवाच्ये च िब्दस्याशप सिकाररत्वं भवत्येव, ... अथयाः िब्दो वेशत शवकल्पाशभधानं प्राधान्यशभप्रायेण। (ध्वन्यालोक प्रथम उद्योत लोचन पृ॰ 104
ििााँ व्यङ््य अप्रधान िोते हुए चमत्कार को उत्पन्न करता िै, वि शितीय उिम काव्य िै। यिााँ अप्रधान िोते हुए िी चमत्कार का िनक िो इस कथन का अशभप्राय िै कक यि व्यङ््य अप्रधान िी िो ककसी भी अथय के प्रशत प्रधान न िो। ऐसा किने से वाच्य की अपेक्षा प्रधान व्यङ््य परन्तु व्यङ््यान्तर की अपेक्षा अप्रधान िो ऐसे व्यङ््य की अप्रधानता में वि उिम काव्य किलाए।
इसका अशभप्राय यि िै कक शिस काव्य में व्यङ््य वाच्य की अपेक्षा प्रधान तथा व्यङ््यान्तर की अपेक्षा अप्रधान िो ऐसा व्यङ््याथय अपने ज्ञान के िारा चमत्कार का िनक िो वि शितीय काव्य िै।
अयं स रसनोत्कषी पीनस्तनशवमदयनाः। नाभयूरुिघनस्पिी नीवीशवस्रंसनाः कराः॥
इस अपराङ्गव्यङ््य के उदािरण में श्रृङ्गार तथा करुण दो व्यङ््य िैं। प्रधान व्यङ््य करुण िै, तथा गौण व्यङ््य श्रृङ्गार िै। श्रृङ्गार रूप िो व्यङ््य वि वाच्य की अपेक्षा प्रधान िोते हुए करुण रूप व्यङ््य की अपेक्षा अप्रधान िोने से लक्षण में अशतव्याशि निीं िोगी, क्योंकक यद्यशप करुण रूप व्यङ््य के प्रशत श्रृङ्गार का अप्राधान्य यिााँ िै तो भी यि श्रृङ्गार रूप व्यङ््य वाच्याथय की अपेक्षा प्रधान िै और लक्षण में ििााँ व्यङ््य अप्रधान िी िो विी काव्य शितीय उिम काव्य किलाएगा।
यकद वाच्य को करुण रूप व्यङ््य प्रधान व्यङ््य का उत्कषयक िोने से श्रृङ्गार की अपेक्षा प्रधान किा िाए तो इस स्थन में अशतव्याशि िोगी।
व्यङ््य रस की अपेक्षा वाच्य वस्तु के चमत्कारोत्कषयक िोने पर भी प्राधान्य किने में प्रमाण का अभाव िै।
प्रदीपोद्योत में प्रकृत श्लोक में श्रृङ्गार िी करुण रस का उत्कषयक िोने के वाच्य की अपेक्षा प्राधान्य किे िाने से अशतव्याशि निीं िोगी।
रस के अपररच्छन्न िोने से रस का पराङ्गत्व कैसे सम्भव िै। यिााँ श्रृङ्गार पद श्रृङ्गार रस के स्थायीभाव रशत परक िै अताः रशत के अङ्ग िोने में कोई आपशि निीं।
शितीय काव्य के लक्षण में चमत्कारकारणम् यि पद निीं िोता तो लीन व्यङ््य, वाच्यशचि में व्यङ््य अप्रधान तो िोता िी िै, अताः शितीय काव्य मे अशतव्याशि िोगी। इसके वारण के शलए चमत्कारकरणम् यि पद कदया गया िै, क्योंकक लीनव्यङ््य तथा वाच्यशचि में व्यङ््य अप्रधान तो िोता िै परन्तु यिााँ व्यङ््य चमत्कार िनक निीं िोता। अताः चमत्कारकारणम् यि पद ग्रिण करने से इनमें अशतव्याशि निीं िोगी।
लीनव्यङ््य, अस्फटव्यङ््य तथा गुणीभूतव्यङ््य काव्य के तृतीय भेद के प्रभेद िैं। वाच्यशचि अथायलङ्कारोपस्कृत अशववशक्षत व्यङ््य चि नाम का काव्य चतुथय भेद अधम काव्य िै। अताः इनमें व्यङ््य के सवयधा अप्रधान िोने से काव्य के शितीय भेद के लक्षण में अशतव्याशि िोगी। इस अशतव्याशि वारण िेतु चमत्कारकारणम् इस पद का लक्षण में समावेि ककया गया िै। चमत्कारकारणम् इस पद के लक्षण में शनवेि से लीनव्यङ््य, अस्फुटव्यङ््य, गुणीभूतव्यङ््य तथा वाच्य शचि में अशववशक्षत व्यङ््य के चमत्कार िनक न िोने से इन प्रभेदों की शितीय भेद के लक्षण में अशतव्याशि निीं िोगी।
अस्फुट व्यङ््य का उदािरण
-अदृिे दियनोत्कण्ठा दृिे शवच्छेदभीरुता। नादृिेन न दृिेन भवता लभयते सुखम्॥
इस उदािरण में यथाऽदृिाः कदाशप न स्यााः, तथा कुरु इस व्यङ््य के िोने पर भी, इस व्यङ््य का सहृदयों को भी सुखपूवयक बोध न िोने से यि व्यङ््य अचमत्कारी िी िै।
इसी प्रकार असुन्दर व्यङ््य का उदािरण
-वानीरकुञ्जोड्डीनिकुशनकोलािलं श्रृण्वन्त्यााः।
गृिकमयव्यापृताया वध्वााः सीदन्त्यङ्गाशन॥
इस असुन्दर व्यङ््य के उदािरण में दिसङ्केताः नायकाः वेतसीलताकुञ्जं प्रशविाः यिााँ यि व्यङ््य भी िै और उपलक्षण भी। इस प्रकार असुन्दर व्यङ््य के भी चमत्कार िनक न िोने से इसमें भी शितीय काव्य भेद में लक्षण की अशतव्याशि निीं िोगी।
उपरर उक्त व्यख्यान में वाच्य शचि से िब्द शचि भी समझना चाशिए, क्योंकक वाच्य शचि की भााँशत िब्दशचि में भी 3. मध्यम काव्य
-आचायय पशण्डतराि िगन्नाथ काव्य का तृतीय भेद मध्यम काव्य प्रशतपाकदत करते िैं
-यि व्यङ््यचमत्कारासमानाशधकरणो वाच्यचमत्कारस्तिृतीयम्।46
ििााँ वाच्य चमत्कार के समानाशधकरण्य में व्यङ््य चमत्कार न िो, अथायत् व्यङ््य चमत्कार की अपेक्षा वाच्य चमत्कार उत्कृि िो वि काव्य का तृतीय भेद मध्यम काव्य किलाता िै।
ििााँ व्यङ््य की प्रतीशत से उत्पन्न चमत्कार िोते हुए भी वाच्याथय की प्रतीशत से उत्पन्न चमत्कार में अन्तर्नयगीणय िोने से स्पितया अनुभव का शवषय निीं बनता वि तृतीय काव्य िै। यिााँ व्यङ््य चमत्कार का सवयथा अभाव निीं िोता। क्योंकक शबना व्यङ््य चमत्कार के वाच्य चमत्कृत सम्भव िी निी िै। आचायय मध्यम काव्य का उदािरण देते िैं
-तनयमैनाकगवेषणलम्बीकृत-िलशधिठरप्रशवि-शिमशगररभुिायमानाया भगवत्या भागीरथयााः सखी।47
यमुना, इन्द्र के भय से समुद्र के अन्त- तल में लीन शिमालय के पुि मैनाक नाम के िैल को खोिने के शलए समुद्र के उदर में प्रशवि लम्बीकृत शिमालय पवयत की भुिा के समान आचरण करता हुई भगवती गङ्गा की सखी िै। प्रकृत उदािरण में तनय मैनाक के अन्वेषण के शलए समुद्र के अन्त-तल में प्रशवि शिमालय की भुिा के समान अथय को व्यक्त करने के शलए भुिायमानायााः इस पद में सदृि आचाराथयक क्यङ् प्रत्यय िै। यद्यशप क्यङ् प्रत्यय उपमा अथय में िै तो भी पययवसान में सम्भावना की प्रतीशत िोने से उपमोपक्रमोत्प्रेक्षा वाच्य िै, तथा गङ्गा की शिमालय की भुिा के साथ की गई उत्प्रेक्षा से 'गङ्गा की स्वच्छता' एवं तनय मैनाक के अन्वेषण में समुद्र के उदर में गङ्गा के प्रवेि से 'गङ्गा का पाताल के अन्ताः तल तक पहुाँचना' व्यङ््य िैं।
यिााँ पश्चात् प्रतीयमान 'गङ्गा की स्वच्छता' एवं 'गङ्गा का पाताल के अन्ताः तल तक पहुाँचना' व्यङ््य चमत्कार को गङ्गा शिमालय की भुिा के समान आचरण कर रिी िैं तथा तनय मैनाक के अन्वेषण में समुद्र के उदर में गङ्गा का प्रवेि वाच्यचमत्कार के िारा शनगीणय कर शलया गया िै। अथायत् व्यङ््य चमत्कार वाच्य चमत्कार की कुशक्ष में प्रशवि िोने से वाच्यापेक्षा अशधक चमत्कार को उत्पन्न निीं करता िै।
व्यङ््य तो स्वयं में चमत्कार िनक िोता िी िै तो यिााँ व्यङ््य चमत्कार का वाच्य चमत्कार से शतरोभूत िोना कैसे सम्भव िै। शिस प्रकार कोई गौराङ्ग ग्राम्य (प्रसाधनानशभज्ञ) नाशयका के िारा काश्मीरद्रवाङ्गराग (केसर गन्धद्रव्य शविेष से शनर्मयत अङ्ग राग) के लेप से उस नाशयका का अपने अङ्गो का गौरत्व शछप िाता िै उसी प्रकार व्यङ््य का स्वयं का चमत्कार वाच्य चमत्कार से शछप िाता िै।48
यिााँ काव्य के तृतीय भेद में व्यङ््य का सवयथा अभाव इि निीं िै क्योंकक कोई भी वाच्य व्यङ््य के चमत्कार के स्पिय के शबना चमत्कारिनक िो िी निीं सकता िै।49 अताः व्यङ््य के सवयथा अभाव की दिा में चमत्कार का अभाव िोने उस िब्द का काव्यत्व िी बाशधत िो िाएगा।
व्यङ््य अप्रधान िोते हुए चमत्कार का िनक िो, अथायत् अप्रधान िोते हुए िागरुक व्यङ््य शितीय उिम काव्य, तथा व्यङ््य अप्रधान िोते हुए वाच्य चमत्कार से शतरोभूत, अथायत् अिागरूक व्यङ््य तृतीय मध्यम काव्य किलाएगा।50
46रसगङ्गाधर प्रथम आनन प॰ 76। 47रसगङ्गाधर प्रथम आनन प॰ 76। 48रसगङ्गाधर प्रथम आनन प॰ 77।
इस प्रकार अप्रधान व्यङ््य की दो शस्थशतयााँ िैं प्रथम अप्रधान िोते हुए िागरूक व्यङ््य तथा अप्रधान िोते हुए अिागरूक व्यङ््य। प्रथम शस्थत में वि काव्य का शितीय भेद उिम काव्य किलाता िै, तथा शितीय शस्थशत में वि काव्य का तृतीय भेद मध्यम काव्य किलाएगा।
समासोक्त्याकद अलङ्कारों में व्यङ््य के गुणीभूत िोते हुए भी चमत्कारिनक िोने से ये अलङ्कार प्रधान काव्य शितीय भेद उिम काव्य किलाएगें। तथा दीपकाकद अलङ्कारों में उपमाकदरूप व्यङ््य के िोते हुए भी व्यङ््य के चमत्कारिनक न िोने से ये अलङ्कार प्रधान काव्य तृतीय भेद मध्यम काव्य किलाएगा। इस प्रकार अलङ्कार प्रधान सभी काव्यों का उक्त दो भेदों में अन्तभायव िो िाएगा।
अधम काव्य
-आचायय काव्य के चतुथय अधम काव्य का लक्षण किते िैं
-यिाथयचमत्कृत्युपस्कृता िब्दचमत्कृशताः प्रधानं, तदधमं चतुथयम्।
ििााँ अथय चमत्कृशत से उपस्कृत िब्द चमत्कृशत प्रधान िो वि काव्य चतुथय भेद अधम काव्य किलाता िै। इस काव्य भेद में भी व्यङ््य िोता िै परन्तु यिााँ व्यङ््य अशववशक्षत िोता िै। यथा
-शमिाशिपुत्िनेिाय, ियीिािवििवे। गोिाररगोिििाय, गोिािे ते नमो नमाः॥
प्रकृत श्लोक में वृत्त्यप्रास से िोने वाले चमत्कार में िी कशव का तात्पयय िोने से िब्दालङ्कार का चमत्कार प्रधान िै। अथय से िोने वाली चमत्कृशत िब्द चमत्कृशत में लीन िब्द की चमत्कृशत में अङ्ग िै। यद्यशप कशवशनष्ठ भगवशिषयक रशत यिााँ व्यङ््य िै तो भी व्यङ््य कृत चमत्कार अस्फुट िोने से कशवतात्पयय शवषय न िोने से लीन िी िै।
यद्यशप एकाक्षरपद्य, अधायवृशियमक, पद्मबन्ध आकद काव्यों में ििााँ अथय कृत चमत्कार न के समान िो एसे काव्यों को पञ्चम भेद अधमाधम में गणना करनी चाशिए।
यद्यशप एकाक्षरपद्य, अधायवृशियमक, पद्मबन्ध आकद में आचायय िारा प्रशतपाकदत काव्य लक्षण रमणीय अथय का प्रशतपादक िब्द काव्य िै यि लक्षण िी निी घटता िै क्योंकक ये पद्य अथय चमत्कृशत िून्य िोने से काव्य पद भाि िी निीं िैं। तो इनके के काव्य का एक पृथक पञ्चम भेद अधमाधम मानना उशचत निीं प्रतीत िोता िै।
शमिाशिपुत्िनेिाय-शमिश्च अशिपुिश्च शमिाशिपुिौ, शमिाशिपुिौ नेिे यस्य साः शमिाशिपुिनेिाः, तस्मै शमिाशिपुिनेिाय। (शमि (सूयय) तथा अशिपुि नेि िैं शिनके उनको।
ियीिािवििवे- िय्यााः िािवस्यापिारकताय ररपोिययग्रीवदैत्यस्य ििवे नािकाय। गोिाररगोिििाय, गोिािे ते नमो नमाः॥