TRIPUR SHAPODDHAR SADHNA PRAYOG
मानव जीवन केबल मात्र एक संयोग नहीं हैं बल्कक ऄनेको ल्वगत जीवन के
कमम फलो का पररणाम हैं,ल्वगत में हुए कमम फल का ऄसर आस जीवन में
पड़ता ही हैं, चाहे हम माने या न माने और आन कमम फलो को समझना आतना
असान नहीं हैं,शास्त्र स्पस्ट करते हैं की “कमो गहनों गल्त “.वही भगवान् श्री
कृष्ण कहते हैं की कोइ भी कमम ऐसा नहीं हैं ल्जसमे कुछ ऄच्छा के साथ
साथ कुछ बुरा ना हो .तब छोटे छोटे से कमम फल का ऄसर तो होगा ही,पर
आन कमम फलो को कैसे आनका सर कम से कम ल्कया जा सकें,ल्जससे एक सुखी
संपन्न जीवन ल्जया जा सकें और जीवन में कुछ ईच्चता के अयाम को
हस्तगत ल्कया जा सकें, आस हेतु महाल्वद्या वगम से सबंल्धत एक ईच्च साधना
जो जीवन में ईन ल्वसंगल्तयों को दूर करने में समथम हैं ल्जसे हम साधारण
तौर पर समझ नहीं पाते और जो ऄतीत में ल्कसी शाप का फल हो .
यह साधना साधक ल्कसी भी शुभल्दन शुरू कर सकता है.
साधक को यह
साधना रात्रीकाल में करनी चाल्हए. समय १० बजे के बाद का रहे.
साधक को स्नान कर लाल वस्त्र को धारण करना चाल्हए तथा लाल असन पर
ईत्तर की तरफ मुख कर बैठना चाल्हए.
साधक को ऄपने सामने देवी ल्त्रपुर भैरवी का यंत्र या ल्चत्र को स्थाल्पत करना
चाल्हए. साधक गुरुपूजन भैरव एवं गणेश पूजन सम्प्पन करे तथा देवी भैरवी के
यंत्र या ल्चत्र का भी पूजन करे. साधक को गुरु मन्त्र का जाप करना चाल्हए.
आसके बाद साधक न्यास करे.
करन्यास
ऐ ं क्लीं स ौः अङ्गुष्ठाभयां नमौः
ऐ ं क्लीं स ौः तर्जनीभयां नमौः
ऐ ं क्लीं स ौः ममायमाभयां नमौः
ऐ ं क्लीं स ौः अनाममकाभयां नमौः
ऐ ं क्लीं स ौः कमनष्टकाभयां नमौः
ऐ ं क्लीं स ौः करतल करपृष्ठाभयां नमौः
हृदयामदन्यास
ऐ ं क्लीं स ौः हृदयाय नमौः
ऐ ं क्लीं स ौः मिरसे स्वाहा
ऐ ं क्लीं स ौः मिखायै वषट्
ऐ ं क्लीं स ौः कवचाय ह ं
ऐ ं क्लीं स ौः नेत्रत्रयाय व षट्
ऐ ं क्लीं स ौः अस्त्राय फट्
न्यास के बाद साधक को देवी ल्त्रपुर भैरवी का ध्यान करते हुवे ल्नम्पन मन्त्र का
जाप करना चाल्हए. साधक को २१ माला मन्त्र का जाप करना है. यह जाप
साधक को रुद्राक्ष की माला से करना चाल्हए.
ॐ ऐ ं स ौः क्लीं स ौः ऐ ं नमौः
(OM AENG SAUH KLEEM SAUH AENG NAMAH)
मंत्र जाप पूणम होने पर साधक को योनी मुद्रा से देवी को जाप समल्पमत करना
चाल्हए तथा देवी को समस्त दोष पाप एवं शाप की ल्नवृल्त के ल्लए प्राथमना करनी
चाल्हए. आस प्रकार साधक को यह क्रम ३ ल्दन करना चाल्हए. ३ ल्दन बाद साधक
को माला को प्रवाल्हत करना चाल्हए.
साधना सम्प्पन होने पर साधक के काल्ममक दोष तथा पापों की ल्नवृल्त होती है
तथा भाग्य का ईदय होता है ल्जससे साधक सभी क्षेत्रो में सफलता की ओर
कदम बढाता है.
मनुष्य का जीवन कइ कइ प्रकार से ल्वशेषताओ को ल्लए हुए ऄपने अप में
एक ऄत्यल्धक जल्टल ब्रह्ांडीय रचना है जो की काल का एक ल्वशेष खंड है.
एक ल्वशेष खंड तक एक ल्नल्ित ल्जव के साथ एक ल्नल्ित घटनाओ ं का
घल्टत होना यही ब्रह्ांडीय संककपना है. ल्वशेष काल्ममक प्रभाव के कारण
ल्वल्वध मनुष्य या ल्जव की गल्त ऄलग ऄलग होती है तथा ल्निय ही हम अज
ल्जस ल्स्थल्त में रह रहे है तथा ल्जन पररल्स्थल्तयों का सामना कर रहे है
ईसके पीछे हमारे आस जीवन के तथा ल्वगत जीवन के कमम की द्रल्ि होती ही
है. क्यों की एक ल्नल्ित ल्क्रया एक ल्नल्ित पररणाम को जन्म देता ही है. आस
प्रकार हमने जो कमम ल्कये है ईसका एक ल्नल्ित पररणाम ब्रह्ाण्ड में ल्नल्हत
हो जाता है जो की हमारे भाग्य की रचना है. जन्म के बाद मनुष्य कइ प्रकार
की ल्वल्वध ल्क्रयाकलापों से गुज़रता हुअ ऄपने जीवन को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम
बनाने की और ऄग्रसर होता है, जीवन में ल्वल्वध सुख भोग की प्राल्ि कर
जीवन में खुशी को प्राि करने की अकांशा प्रायः सभी मनुष्य में होती ही है
तथा जीवन के एक भाग में वह आच्छा के प्रबल वेग की पूल्तम के ल्लए वह सुख
की प्राल्ि के ल्लए कुछ न कुछ कायम करने के ल्लए अगे बढ़ता है. आसी सुख
की प्राल्ि तथा कामना के ल्लए मनुष्य पररश्रम करता है, ल्वल्वध व्यापार,
कायम, नौकरी अल्द लेल्कन कइ बार आन सब के बावाजूद भी वह योग्य
पररणाम प्राि नहीं होता है जो की पररश्रम के ऄनुपात में होना चाल्हए था.
और जब आस प्रकार कइ बार होने लगता है जब भाग्य साथ नहीं देता या ल्फर
जब कायम करने पर भी योग्य पररणाम की प्राल्ि नहीं होती है ल्जसके द्वारा
सुख भोग या समृल्ि को प्राि ल्कया जा सके तब मनुष्य हताश हो जाता है,
ल्नराशा ईसके जीवन में गतम होने लगती है तथा वह ल्हनभावना का ल्शकार
होने लगता है, आन सब कारणों के तहत मनुष्य का स्वास््य भी ल्बगड सकता
है तथा ल्वल्वध प्रकार के शारीररक मानल्सक रोग से ग्रस्त वह व्यल्ि का
जीवन और भी ऄल्धक समस्याओ से ग्रस्त हो जाता है. वस्तुतः ल्कसी भी
रूप से यह योग्य पररल्स्थल्त नहीं कही जा सकती है, आस प्रकार का जीवन
एक बोल्जल जीवन बन जाता है जहां पे सुख समृल्ि के ऄभाव में और भी
समस्याओ का सामना मनुष्य करता ही रहता है. ऐसे समय पर मनुष्य ल्वल्वध
समाधान को प्राि करने के ल्लए ऄग्रसर भी होता है मगर कोइ समाधान
द्रल्िगोचर नहीं होता है, या ल्फर जो समाधान नजरो के सामने अते भी है वह
ऄवास्तल्वक प्रतीत होते है. लेल्कन ऄगर हम तंत्र क्षेत्र की तरफ द्रल्ि करें तो
ल्निय ही हमें ऄपने जीवन की सभी समस्याओ का समाधान प्राि होता है,
वस्तुतः हमारी ऄवलेहना तथा लापरवाही ने आस महान ल्वद्या का ग्रास ल्कया
है लेल्कन ल्फर भी कइ महाल्सिो के कारण यह दुलमभ ज्ञान सुरल्क्षत रह सका
ल्जसमे एक तरफ भोग पक्ष या भौल्तक जीवन से सबंल्धत सभी समस्याओ
का समाधान है वही ीँ दूसरी तरफ अध्यात्म ईत्थान से सबंल्धत प्रयोग भी है.
श्रीसदगुरुदेव ने ऄपने जीवन काल में समय समय पर कइ ल्वशेष प्रल्क्रयाओ
को प्रदान ल्कया था, ल्जसके माध्यम से साधक ऄपने जीवन में कइ कइ
समस्याओ का समाधान कर सकता है. समृल्ि की वृल्ि तथा जीवन में सुख
भोग प्राि करने के ल्लए ईन्होंने कइ ल्वधानों को साधको के मध्य स्पि ल्कया
था तथा प्रायोल्गक रूप से संपन्न भी करवाया था. लेल्कन धीरे धीरे ऐसे कइ
ल्वधान लुि होने लगे. ऐसे कइ दुलमभ प्रयोग काल क्रम में जैसे ऄद्रश्य ही हो
गए थे. ऐसा ही एक प्रयोग है भुवनेश्वरी प्रयोग जो की समृल्ि की प्राल्ि के ल्लए
ऄल्द्वतीय प्रयोग है. आस प्रयोग को सम्प्पन करने के बाद साधक के जीवन में
कइ प्रकार से समृल्ि का ल्वकास होता है, साधक का मान सन्मान बढ़ता है,
समाज में व्यल्ि का स्थान और भी महत्ता लेने लगता है. साधक के जीवन में
धन की समस्याओ का समाधान प्राि होता है, व्यापार कायम क्षेत्र अल्द में
ऄगर साधक को योग्य पद नहीं ल्मलता है तो ईसकी पदोन्नल्त होती है. आस
प्रकार अज के युग में यह प्रयोग बहोत ही ज्यादा ईपयोगी है, साथ ही साथ
यह प्रयोग सहज भी है ल्जससे कोइ भी साधक आसको सम्प्पन कर सकता
है.
यह प्रयोग साधक ल्कसी भी शुभ ल्दन से शुरू कर सकता है.
साधक को रात्री काल में स्नान करना चाल्हए. स्नान करने के बाद साधक
लाल रंग के वस्त्र धारण करे तथा लाल रंग के असन पर बैठ जाए. साधक
का मुख ईत्तर ल्दशा की तरफ होना चाल्हए.
साधक को सवम प्रथम ऄपने सामने लाल रंग के वस्त्र पर देवी भुवनेश्वरी का
यंत्र या ल्चत्र स्थाल्पत करना चाल्हए. साधक सवम प्रथम गुरु पूजन सम्प्पन
करे. तथा आसके बाद देवी भुवनेश्वरी ये यंत्र ल्चत्र का भी पूजन सम्प्पन करे.
पूजन में साधक लाल रंग के पुष्प समल्पमत करे. साधक को यथा संभव गुरु
मन्त्र का जाप करना चाल्हए. आसके बाद साधक मायाबीज से न्यास करे.
करन्यास
ह्ां ऄङ्गुष्ठाभयां नमः
ह्ीं तजमनीभयां नमः
ह्ूं मध्यमाभयां नमः
ह्ैं ऄनाल्मकाभयां नमः
ह्ौं कल्निकाभयां नमः
ह्ः करतल करपृष्ठाभयां नमः
अङ्गन्यास
ह्ां रृदयाय नमः
ह्ीं ल्शरसे स्वाहा
ह्ूं ल्शखायै वषट्
ह्ैं कवचाय हूम
ह्ौं नेत्रत्रयाय वौषट्
ह्ः ऄस्त्राय फट्
आसके बाद साधक देवी का ध्यान करे.
ईद्यल्दनद्युल्तल्मन्दुल्करीटां तुगंकुचां नयनत्रय्युिाम् !
स्मरेमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभील्तकरां प्रभजे भुवनेशीम् ||
ध्यान के बाद साधक को ल्नम्पन मन्त्र की ५१ माला मन्त्र जाप करना चाल्हए.
ॐ श्रीं ह्रीं ह्रूं सौः (OM SHREENG HREENG HROOM SAH)
साधक यह जाप ल्कसी भी शल्ि माला, मूंगा माला से कर सकता है. मन्त्र
जाप पूणम होने पर साधक को शहद के द्वारा आसी मन्त्र के माध्यम से १०१
अहुल्त ऄल्ग्न में समल्पमत करनी चाल्हए.
साधक को यह क्रम ३ ल्दनों तक करना चाल्हए. ईसके बाद ल्चत्र यंत्र को
साधक ऄपने पूजा स्थान में स्थाल्पत कर दें. माला का ल्वसजमन साधक को
नहीं करना है, भुवनेश्वरी सबंल्धत प्रयोग में आस माला का ईपयोग ल्कया जा
सकता है.
KAAL JIVHA PRAYOG
सर्वे भर्वन्तु सुखखना....
हमारे र्वैखदक ऊखियो से ले कर अधुखनक खसद्धोंने भी मनुष्य के जीर्वन
को हमेशा ईर्धर्ववगामी बनाने के खलए खर्वशेि ज्ञान और अशीर्ववचन प्रदान खकये है. मनुष्य सुखी
बने, सम्प्पन बने तथा जीर्वन के खर्वखर्वध पक्षों में पूणव सफलता को ऄखजवत करे. र्वस्तुतः हर एक
मनुष्य ऄपने जीर्वन में आसी कोखशश में भी लगा रहता है खजससे की र्वह पूणव सुख भोग की प्राखि
कर ही सके. भाग्यर्वान पुरुि ऄपने जीर्वन में पूणव पररश्रम के मार्धयम से सफलता को प्राि कर
भी लेते है लेखकन यह ऄल्प संखयांक ईदहारण है. क्यों की सफलता प्राखि के खलए जो शखि
की अर्वश्यकता होती है र्वह सभी व्यखियो के पास हो ऐसा ज़रुरी नहीं है. लेखकन मनुष्य
जीर्वन भी ऄपने अप में ऄद्भुत क्षमताओ से युि है ही. जो प्राि हो ईसका पूणव अनंद प्राि
करना तथा जो ऄप्राि हो, या जो जीर्वन की न्युनातायें हो, जो बाधाएं हो ईसको दूर करना, तथा
जो भी जीर्वन में पूणव अनंद की प्राखि के खलए अर्वश्यक हो, ईन सुख भोग की प्राखि करना.
जब हमारे पास शखि का ऄभार्व हो, कुछ प्राखि के खलए जो अर्वश्यक क्षमताओं की ज़रूरत
हो र्वह शखि न हो ईस समय हम देर्वशखियों के मार्धयम से हम ईनकी साधना ईपासना कर के
शखि को प्राि कर सकते है तथा हमारे जीर्वन के ऄभार्वो को दूर कर सकते है तथा तंत्र
साधनाओ का भी यही र्वास्तखर्वक स्र्वरुप है. हमारी ऄनंत क्षमताओ का, हमारी ऄनंत शखियों
का खर्वकास करना तथा पूणवता की और कदम बढ़ाना. हम ऄपने जीर्वन में भी सुख ऐश्वयव की
प्राखि कर जीर्वन के भौखतक पक्ष को भी पूणव सफलता के साथ खजयें तथा साथ ही साथ जीर्वन
में ऄर्धयाखममक अनंद की प्राखि भी करे तथा ऄपने जीर्वन को ईर्धर्वव गखत प्रदान करे. और आसी
क्रम में कइ कइ प्रयोग साधको के मर्धय समय समय पर हमारे प्राचीन ऄर्वावचीन ऊखि मुखनयों ने
प्रस्तुत खकये है. साथ ही साथ
कई प्रयोग ििििध कारणों सह अिधक गुप्त रखे गए थे. ऐसा
ही एक प्रयोग है कालिजह्वा प्रयोग. जो की अित गुप्त रूप से प्रचिलत रहा है. मूलतः
यह प्रयोग िाम मागी है जो की साधको के द्रारा तामिसक िसिियों की प्रािप्त के िलए
िकया जाता था. इसी एक प्रयोग से साधक कई प्रकार के ताांििक कमो को कर सकता
है, लेिकन आज के युग में यह सहज सांभि नहीं है तथा सामािजक द्रिि से भी एक
अित ििशेष क्रम लांबे समय तक अपनाना आज के युग में सभी गृहस्थ साधको के बस
की बात नहीं है. इसी िलए इस साधना से सबांिधत एक गोपनीय राजिसक क्रम के बारे
में सदगुरुदेि ने बताया था, इसके माध्यम से साधक को अपने जीिन की कई
समस्याओ के समाधान प्राप्त होता है.
साधक की शत्रुओ की गखत मखत का स्तम्पभन होता है. चाहे र्वह व्यापर का क्षेत्र हो या ऄपना
कायव क्षेत्र साधक को खकसी भी िड्यंत्र का खशकार होने से यह साधना बचाती है तथा एक
खर्वशेि ऄद्रश्य कर्वच बनाती है.
साधक के कोइ कायव खर्वशेि अखद में कोइ बाधा अ रही हो या कोइ व्यखि खर्वशेि कायव नहीं
कर रहा हो या परेशान कर रहा हो, बार बार खकसी न खकसी रूप में कायव को होने से ऄटका रहा
हो तो आस प्रयोग से समाधान प्राि होता है.
साधक या साधक के घर पर कोइ आतरयोनी से सबंखधत बाधा हो तो ईसका खनराकरण आस
प्रयोग के मार्धयम से प्राि होता है.
आस द्रखि से यह ऄमयंत ही महमर्वपूणव प्रयोग है तथा अज के युग में र्वरदान स्र्वरुप ही है.
साधक यह प्रयोग खकसी भी कृष्ण पक्ष की ऄिमी को करे. ऄगर यह संभर्व न हो तो साधक
खकसी भी रखर्वर्वार को यह प्रयोग करे. समय राखत्र में १० बजे के बाद का रहे.
साधक स्नान अखद से खनर्वृत हो लाल र्वस्त्र धारण कर लाल असन पर बैठ जाए. साधक का
मुख ईत्तर खदशा की तरफ होना चाखहए.
साधक ऄपने सामने बाजोट पर लाल र्वस्त्र खबछा कर ईस पर भगर्वती काली की प्रखतमा या यंत्र
स्थाखपत करे.
अगर पूणण चैतन्य ििशुि पारद काली ििग्रह या महाकाली रक्षात्मक
चैतन्य यांि का स्थापन करे तो श्रेष्ठतम प्रभाि की प्रािप्त सांभि है. (इतरयोनी मांडल में
चैतन्य महाकाली रक्षात्मक यांि अांिकत स्थािपत एिां पूणण प्रितिष्ठत है इतरयोनी मांडल
प्राप्त सभी साधक मांडल का स्थापन कर उस यांि पर इस प्रयोग को सम्प्पन कर सकते
है.)
यंत्र/ खर्वग्रह का पूजन करे. ऄगर यंत्र या खर्वग्रह संभर्व न हो तो महाकाली का खचत्र स्थाखपत
कर के भी यह प्रयोग सम्प्पन करना चाखहए.
साधक सदगुरुदेर्व का तथा यंत्र/खर्वग्रह का पूजन करे. यंत्र पूजन में साधक लाल रंग के पुष्प तथा
कुमकुम ऄखपवत करे. गुड़ का भोग लगाए.
आसके बाद साधक गुरु मन्त्र का जाप करे. खफर साधक सदगुरुदेर्व तथा भगर्वती महाकाली से
साधना में सफलता के खलए प्राथवना करे. आसके बाद साधक एक नाररयल का गोला ( सुखा
नाररयल खजसमे पानी रहता है ईसको फोड़ने पर कटोरे अकार का गोला बनता है र्वह) ले
ईसको दीपक के रूप में प्रयोग करना है, गोले के ऄंदर तेल भरे. तथा दीपक प्रज्र्वखलत करे.
आसके बाद साधक न्यास करे.
करन्यास
कलाां अङ्गुष्ठाभयाां नमः
कलीं तजणनीभयाां नमः
कलूां सिाणनन्दमिय मध्यमाभयाां नमः
कलैं अनािमकाभयाां नमः
कलौं किनिकाभयाां नमः
कलः करतल करपृष्ठाभयाां नमः
रृदयािदन्यास
क्राां रृदयाय नमः
क्रीं िशरसे स्िाहा
क्रूां िशखायै िषट्
क्रैं किचाय ह ां
क्रौं नेिियाय िौषट्
क्रः अस्त्राय फट्
आसके बाद साधक भगर्वती महाकाली का र्धयान कर मूल मन्त्र का जाप करे. यह जाप साधक
खकसी भी रुद्राक्षमाला, शखिमाला, मूंगामाला, ऄक्षमाला से कर सकता है. साधक को २१
माला मन्त्र जाप करना है.
ॎ कलीं क्रीं कालिजह्वायै क्रीं कलीं फट्
(OM KLEENG KREENG KAALAJIHVAAYAI KREENG KLEENG
PHAT)
जाप पूणव होने पर साधक भगर्वती महाकाली को मन्त्र जाप समखपवत कर अशीर्वावद के खलए
प्राथवना करे. भोग स्र्वयं ग्रहण करे. साधक को माला का खर्वसजवन नहीं करना है, भगर्वती काली
से सबंखधत साधना में आस माला का प्रयोग खकया जा सकता है. दीपक के खलए खजस नाररयल
के गोले का ईपयोग खकया गया है ईसको स्मशान में या खनजवन स्थान में रख दे. आस प्रकार एक
ही राखत्र में यह प्रयोग पूणव होता है.
MARCH MAAH KI ADBHUT SADHNA -BHAGWATI NEEL TARA SADHNA
बुखद्ध देखह ,यशो देखह ! कखर्वमय देखह देखह में |
कुबुखद्ध हर में देखह ! त्राखह मााँ शरणागतम ||
स्तोत्रेणानेन देर्वेखश स्तुमर्वा देखर्वं सुरेस्र्वरीम |
सर्वावन कामानर्वा्नोखत सर्वव खर्वद्या खनखधभावर्वेत ||
भगर्वती नील तारा की र्वन्दना ऄपने अप में ही स्पस्ट हैं की बुखद्ध, ज्ञान, यश सभी भगर्वती
अद्या शखि मााँ नील तारा की एक कृपा कटाक्ष से ही संभर्व हैं,और समस्त कामनाओं की पूखतव
और समस्त खर्वद्याओं में योग्यता की पूखतव स्र्वतः ही नीलतारा साधना से सहज संभर्व
हैं.
सदगुरुदेर्व जी ने कइ कइ बार यह समझाया की जीर्वन में ऄगर अर्धयाखममकता की उाँचाइ
ऄखनर्वायव हैं तो भौखतक जीर्वन को एक ठोस अधार देना भी एक अर्वश्यक ऄंग हैं और मैं
यखद ऐश्वयव में रहता ह ाँ तो मेरे खशष्यों को भी ईसी ऐश्वयव के साथ जीर्वन जीना चाखहए और यह
दोनों ऄर्वस्था खसफव एक ही साधना से संभर्व हैं,र्वह हैं भगर्वती तारा साधना.
भगर्वती तारा के
ऄनेको स्र्वरुप में जो धनप्रदायक और र्वैभर्व के साथ सम्पपूणव ऄथो में श्री प्राखि के खलए
सर्वावखधक ईपयुि हैं र्वह हैं ईनका नील सरस्र्वती स्र्वरुप और ईस स्र्वरुप में भी यखद मेधा युि
की बात हो रही हैं तो यह ऄद्भुत हैं.क्योंखक खबना मेधा, खबना ज्ञान और खबना बौखद्धक क्षमता के
जीर्वन मात्र एक केचुएर्वत से ऄखधक कुछ नहीं हैं.क्योंखक एक ईच्चस्तरीय मेधा ही जीर्वन का
अधार हैं, जीर्वन को एक ईचाइ तक पहुचाने के खलए यह एक ऄखनर्वायवता ही समझी जाए.
और यह केबल प्रयासों से तो संभर्व नहीं हैं,ईसके खलए साधना बल की ऄमयंत अर्वश्यकता
हैं.
आसखलए सदगुरुदेर्व जी ने बार बार साधना पर जोर खदया ईन्होने कहा की केबल बैठे रहने
से, केबल ऄपने भाग्य को कोसते रहने से कुछ भी संभर्व नहीं हैं,ऄगर जीर्वन में सदगुरुदेर्व
खमल गये और साधक खफर भी हाथ पर हाथ धरें बैठा रहे तो यह तो नदी के पास जाकर भी
्यासे रह जाने र्वाली दुभावग्यतम खस्थखत होगी.साधक से खशष्य तक की यात्रा साधना मागव से
बहुत असानी से, पर ठोस रूप में संभर्व हैं
,अज के युग में धन की अर्वश्यकता सर्वोपरर हैं
पर ईसके साथ ईसका कहााँ ईपयोग करना हैं और खकस तरह से,आसके खलए तो मेधा की
जरुरत हैं ही, ऄन्यथा खसफव मेधा से या खसफव धन से तो जीर्वन एकांगी हो जायेगा.
आस साधना के ऄनेको लाभ हैं .
बुखद्ध पक्ष से कमजोर व्यखि भी एक ईच्च प्रज्ञायुि व्यखि बन सकता हैं.
खर्वद्याथी र्वगव भी आस साधना के मार्धयम से ऄपने शैखक्षक जीर्वन में ईच्चतर ईन्नखत प्राि कर
सकते में समथव हो जाते हैं.
माता खपता भी ऄपने बच्चो के खलए यह प्रयोग संपन्न कर ईनके ईच्चतम खशक्षा प्राि करने के
ऄर्वसर में और भी ऄनुकूलता प्रदान कर सकते हैं.
युर्वा र्वगव भी खजन्हें नौकरी हेतु या ईच्चतर ऄर्धययन के खलए साक्षामकार में जाना हो ईनके
खलए भी यह साधना सौभाग्य के द्रार खोलने में समथव हैं.
साधको के खलए खबखभन्न ईच्चतम अर्धयाखममक खर्वद्याओं की प्राखि के मागव को भी सुगम बना
सकने में यह साधना समथव हैं.
अजीखर्वका में ईन्नखत हेतु भी आस साधना की ऄपनी ही एक महमर्वता हैं.
जीर्वन को अखथवक और समस्त दृिी से पूणवता प्रदान करने हेतु आस साधना का ऄपना ही
एक महत्त्र्व हैं.
र्वही ाँ एक महाखर्वद्या के आस स्र्वरूप की खसखद्धता प्राि होने से आस महाखर्वद्या की पूणव खसखद्ध के
मागव की र्वाधाएं भी दूर होती हैं.
भगर्वती नील तारा का स्र्वरुप केबल खर्वद्या तक ही खसखमत नहीं हैं बखल्क समस्त प्रकार के
शत्रुओ का र्वह चाहे अन्तररक हो या बाह्य सभी के खनमूवलन के खलए भी आस साधना का
ऄपना ही एक महत्त्र्व हैं.
आस तरह से देखा जाए तो यह साधना जीर्वन का सौभाग्य हैं.और अज के समय एक ऐसी
सरल साधना का प्राि होना सदगुरुदेर्व का अशीर्वावद ही हैं और भगर्वती अद्या मााँ का कृपा
कटाक्ष.
पर यह साधना होलािक में की जाए तो खर्वखशि प्रभार्व प्रदान करती हैं, आस बार
माचव महीने
के
२० तारीख को न केबल होलािक प्रारम्पभ हैं बखल्क ईस खदन ऄिमी भी हैं जो की भगर्वती
तारा साधना के खलए एक ईत्तम खतखथ भी हैं.और खदन भी बुधर्वार हैं,जो की एकऄद्भुत संयोग
हैं.आस तरह से एक ऄखद्रतीय साधना के खलए खर्वखशि मह तव का खनमावण हुअ हैं.
आस का पूरा
लाभ साधक र्वगव को लेना ही चाखहए. ऄब कौन ऐसा होगा जो आस साधना को न करना
चाहेगा.
साधना खर्वधान भी बहुत सरल हैं.साधक को रात्री में १० बजे के बाद स्नानं करके गुलाबी रंग
की धोती धारण कर और गुलाबी रंग असन बैठ कर साधना प्रारंभ करें.आस साधना में खजस
ऄद्भुत तेजस्र्वी यन्त्र की अर्वश्यकता होती हैं, र्वह हैं
‚पूणण नील तारा मेधा यन्ि‛
और
खनखित सफलता प्रदायक मंत्रो से खसद्ध और प्राण ईजाव युि खसखद्ध प्रद रुद्राक्ष
यह हम अपको ईपहार स्र्वरुप प्रदान कर रहे हैं.
यह तीन खदर्वसीय साधना क्रम हैं .और मात्र पांच माला मंत्र जप ही हर रात्री में खकया जाता
हैं.यह मंत्र जप स्फखटक माला या मूंगा माला या सफ़ेद हखकक माला से ही खकया जाना
चाखहए,आस माला को प्राण प्रखतखित होना चाखहये,और यह माला प्राण प्रखतिा खर्वधान पूणवता
के साथ हमने तंत्रकौमुदी पखत्रका में खदया हुअ हैं.ऄतःअप बाज़ार से खनदेखशत माला लाकर
ईसे प्राण प्रखतखित कर लें,संभर्व हो तो तीन खदन के ईपरान्त शुद्ध घी से १६ अहुखत भी आसी
मंत्र से दी जाए.और साधना पूरी होने के बाद आस यन्त्र और रुद्राक्ष को ऄपने पूजा स्थान में ही
रहने दे और संभर्व हो तो आस मंत्र की एक माला जप हर खदन करते जाए, यह साधना ईजाव को
अपमें पूणवता के साथ समाखहत करने में सहयोगी होगी .
अप में से जो भी भाइ बखहन आस साधना को करने का मानस बना रहे हैं
र्वह आस साधना के
खलए ऄखनर्वायव पूणव नील तारा मेधा साधना यन्त्र और खर्वखशि रुद्राक्ष की प्राखि के खलए
[email protected]
पर सम्पपकव कर लें . यह पूणवतया खनशुल्क हैं.और आसको
हम ऄपने व्यय पर ही अपको भेजेंगे .साथ ही साथ आस साधना में खजस मंत्र का जप खकया
जाता हैं र्वह हम अपको यन्त्र के साथ ही भेजेंगे .
हमारा मूल ईदेश्य यही हैं खक हमारे भाइ बखहन आस योग्य बने की र्वह समस्त दृिी से सुखी
संपन्न हो और आसमें अखथवक रूप से ईनकी सुदृढ़ता भी एक अर्वश्यक ऄंग रहा हैं तभी एक
साधक का साधकमर्व को एक खदशा या अधार खमलेगा तो र्वह जीर्वन के सभी पक्षों का अनंद
लेते हुए,साधना पथ पर चलते हुए पूरी प्रसन्नता और ईल्लास के साथ सदगुरुदेर्व के स्र्व्न
को साकार करने में और एक योग्य साधक बनने में ऄपने जीर्वन को एक ऄथव दे सकने में
समथव होंगे.
BHAGVATI NEEL SARASWATI SADHNA
'सर्व्र्व््वागीश्वरो मर्त्यो लोक़्श्यो धनेश्वराः रणे धूते व््वदे च स्ायोवितवम ित्र्ो दवसतवां
यववतत सर्व््ेिवम ्ल्लभाः सदव तस्य गेहे वस्थरव लक्ष्मीर्व््वानी ्क्त्त्रे ्सेद्ध्रु्ां तस्य
स्ाथवावसद्दी: स्यवध्यद्ध््मनवसी ्ताते' ||
श्री तवरव वितीय महवव्द्यव के रूप में प्रवसद्ध हैं ाआनकी सवधनव से सवधक को सांसवर की
्वस्तव्कतव कव बोध होतव है तथव सवधक ाऄनविवि तर्त्् को प्रवप्त कर स्ोच्चवटन की
वसवद्ध प्रवप्त करतव है.
श्री तवरव महवव्द्यव की ाईपवसनव श्री व्द्यव के रूप में भी जवती है, और श्री व्द्यव की
ाईपवसनव कव स्ाश्रेष्ठ सवधन है श्री यांत्र .
ाऄब श्री यांत्र से मतलब ये नहीं की ाआस पर ाआस पर वसर्ा श्री सवधनव यव वत्रपुरव सवधनव ही
सांपन्न की जवये, ये तो यांत्ररवज हैं और ाआन पर तो ाऄनेकों सवधनवएां सांपन्न की जव सकती है
और महव व्द्यव की तो सवरी सवधनवएां ाआस पर कर सकते हैं .
श्री तवरव यतत्र की ाऄवधष्ठवत्री पीठिवि के दे्तव भी मव तवरव हैं और ये यांत्रवर्त्मक रूप में
सभी र्लों को देने में समथा हैं यववन धमा, ाऄथा, कवम,मोक्ष . तवरव महवव्द्यव ही िवस्त्रों में
तवररणी, नील सरस््ती, ाईग्रतवरव ाअदद नवमों से जवनी जवती हैं
और यदद दकसी िुभ मुहूता में और ाआनके व्विष्ट रूप की सवधनव की जवये तो ाईत्तम और
यदद ्ो मुहूता बसांत ाऊतु की पांचमी हो और सवथ गुप्त न्रवत्री की पांचमी तो ाऄवत ाईत्तम.
बहनों भवाआयों ्ैसे भी बसांत पांचमी पर मवाँ सरस््ती की पूजव कव व्धवन है,और क्त्यव ाअप
जवनते हैं दक मवाँ तवरव कव एक रूप व्द्यव दववयनी कव भी है, और वजतहें हम नीलसरस््ती
के नवम से जवनते है. छवत्रों और बच्चों के बुवद्ध दक प्रखरतव के वलए, व्द्यव के व्कवस के
वलए और प्रर्त्येक क्षेत्र में ाईन्नवत के वलए ाआनकी सवधनव कव कोाइ जोड़ नहीं---
तो बसांत पांचमी जैसव िुभ मुहूता ाअप और नील सरस््ती सवधनव... :)
सदगुरुदे् ने ाऄपनी दकतवब तवरव सवधनव में बतव है दक भग्ती तवरव दक सवधनव से
व्यवि दूसरों को प्रभवव्त करने ्वली िवि प्रवप्त करतव ही है सवथ में प्रर्त्येक क्षेत्र में
सर्लतव प्रवप्त करतव चलव जवतव है चवहे ्ो व्द्यव कव हो कोटा कचहरी कव मवमलव हो यव
दकसी भी ित्रु से पीवड़त हो हर ाईसे सर्लतव ही वमलती है.
्ैददक कवल से ाअज तक सभी ाऊवि-मुवनयों ने एक ही स््र में ये स््ीकवर दकयव है दक
सांसवर की स्ोर्त्कृष्ट सवधनवओं में महवव्द्यव सवधनव स्ाश्रेष्ट हैं. और तवरव सवधनव की तो
भूरी-भूरी प्रिांसव की है. ये सवधनव महर्त््पूणा ए्ां पूणा सौभवग्यदवयक हैं.
मवाँ तवरव कव पांचवक्षर मतत्र से व्यवि धवरव-प्र्वह बोलने में वसद्धहस्त होतव है और विक्षव
के क्षेत्र में ाऄवितीय बनतव है और नील सरस््ती सवधनव की तो बवत ही कुछ ओर है कहव
जवतव है की जब बच्चव जतम ले तो ाईसे स्नवन कर्वके दू्वा से ाईसकी वजर्व्हव पर ाआस मांत्र के
बीजवक्षर को वलख ददयव जवये तो ाईसे समस्त िवस्त्र कांठस्थ हो जवते हैं और समस्त सांसवर
में ाईसे व्जय प्रवप्त होती है और व्द्यव के क्षेत्र में पूणा वसवद्ध प्रवप्त होती है (
दकततु वलखने
्वले ने पहले ाआस मांत्र को व्वध्त वसद्ध दकयव हो ये ाऄवन्वया है
)
्ैसे ाआस मांत्र की वसवद्ध एक लवख जप और ्ो भी पूणा व्धवन से करने पर वमलती है
दकततु एक व्विष्ट मुहूता में एक व्विष्ट व्वध से की जवये तो भी सर्लतव वमलती ही है
चूाँदक सदगुरुदे् िवरव प्रदत्त और ाईनकव ही कथन है तो हमवरे वलए तो ये ब्रह्म्वक्त्य और
्रदवन है तो हमे वनवित ही ाआस सवधनव को करनवही चववहए.
बसांत पांचमी कव िुभ ददन और नील सरस््ती जैसी सवधनव व्धवन होगव तो मै जवनती हूां
मेरे वप्रय भवाइ और बहन वबनव सवधनव दकये रह ही नहीं सकते...
सवधनव सवमग्री----
ाऄष्ट गांध, पीले यव लवल पुष्प, ाऄक्षत, वसतदूर रुद्रवक्ष यव पीले पीले हकीक की मवलव, यदद
हो सके तो तवरव यतत्र यव श्री यांत्र यव तवरव व्ग्रह और यदद ये कुछ भी न हो तो एक पीले
्स्त्र पर ाऄष्ट गांध से
"ऐं "
बीज वलख कर ाईसकव पूजन कर लीवजए...
सवधनव व्धवन---
बसांत पांचमी के ददन प्रवताः ४ से ६ बजे के मध्य पीले ्स्त्र धवरण कर पीलव ही ाअसन
ाईत्तर यव पू्ा ददिव की ओर मुख करके बैठ जवएाँ...
गुरु पूजन कर चवर मवलव गुरुमांत्र की करके गणेि पूजन और भैर् पूजन सांपन्न करके
गुरुदे् से सवधनव में सर्लतव कव ाअिी्वाद प्रवप्त करें, तथव सांकल्प लें....
सवधनव प्रवरम्भ करें----
ध्यवन---
ाऄटटवटटहववस्नतवामवतघोररूपवम् |
व्यवघ्रवम्बरवम िविधरवां घननील्नवाम,
कत्रीकपवलकमलववसकरवम वत्रनेत्रवां--
मवलीढपवदि्गवां प्रणमववम तवरवम ||
व्वनयोग:-
ॎ ाऄस्य महवव्द्यव मतत्रस्य ब्रह्मव ाऊवि ाऄनुष्टुप छांद, सरस््ती दे्तव,
ममवभीष्ट वसध्यथे जपे व्वनयोगवय
.
करन्यास
ऐं ऄङ्गुिाभयां नमः
ऐं तजवनीभयां नमः
ऐं सर्वावनन्दमखय मर्धयमाभयां नमः
ऐं ऄनाखमकाभयां नमः
ऐं कखनिकाभयां नमः
ऐं करतल करपृिाभयां नमः
रृदयािदन्यास
ऐं रृदयाय नमः
ऐं खशरसे स्र्वाहा
ऐं खशखायै र्विट्
ऐं कर्वचाय ह ं
ऐं नेत्रत्रयाय र्वौिट्
ऐं ऄस्त्राय फट्
नील सरस््ती मांत्र---
ऐं ह्रीं श्रीं क्त्लीं ह्रीं ऐं बलूां स्त्रीं
नीलतवरे सरस््ती द्रवां द्रीं क्त्लीं बलूां स: |
ऐं ह्रीं श्रीं क्त्लीं सौं: सौं: ह्रीं स््वहव
|
aing hreem shreem kleem HREEM aing bloom streem
neeltare sarswati draam dreem kleem bloom sah.
aing hreem shreem kleem sauh sauh (
सौ: सौ: ) hreem
swaha
ाईपरोि मांत्र की
११ मवलव
मांत्र करें. दर्र मवलव गले धवरण करले तथव दू्वा से ाऄष्टगांध
लेकर ाऄपनी वजर्व्हव पर
"ऐं"
मतत्र कव ाऄांकन करें---- तथव गुरुमांत्र की चवर मवलव पुनाः करे.
दर्र मांत्र गुरुदे् को समर्पपत कर सवधनव की सर्लतव कव पुनाः ाअिी्वाद प्रवप्त करें---
ाऄब यदद सांभ् हो तो ११ ददन तक १-१ मवलव ाआस मांत्र की करेंगे तो ाऄवत ाईत्तम...
BHAGVATI BHUVANESHVARI PRAYOG
पृथ्र्वी लोक पर शायद ही ऐसा कोइ साधक को जो भगर्वती के आस स्र्वरुप से पररखचत न
हो. दस महा शखि ऄथावत महाखर्वद्याओ में भुर्वनेश्वरी महाखर्वद्या ऄमयंत ही खर्वशेि स्थान है.
भगर्वती के नाम के खर्वखर्वध ऄथव ही ईनकी शखि और सामथ्यव के बारे में संकेत कर ही देते है
लेखकन खफर भी ईनकी कृपा द्रखि साधक के जीर्वन में खकतना अनंद प्रदान कर सकती है आसकी
कोइ सीमा ही नहीं है. ऄनंत संभार्वनाओं के रस्ते खोल देती भगर्वती भुर्वनेश्वरी के नाम का ऄथव
ही है ब्रह्माण्ड की ऄखधिात्री. जो ब्रह्माण्ड की ऄखधिात्री स्र्वयं है,र्वह ऄपने साधक को भला
क्या प्रदान नहीं कर सकती है. ऄगर साधक पूणव श्रद्धा और समपवण के साथ भगर्वती की
साधना करता है तो खनिय ही ईसे ऄनुकूलता की प्राखि होती है भले ही र्वह ऄर्धयाखममक क्षेत्र
हो या भौखतक क्षेत्र. भगर्वती साधक के दोनों ही क्षेत्र में ईन्नखत का अशीर्वावद प्रदान करती है.
देर्वी की साधना ईपासना जीर्वन को सुखमय बनाने के खलए, ऐश्वयव की प्राखि के खलए
तथा ऄर्धयाखममक ईन्नखत के खलए अखदकाल होती अइ है. आस रहस्यमय शखि स्र्वरुप से
सबंखधत कइ गुि प्रयोग एर्वं प्रखक्रयाए है खजसके सबंध में खर्वर्वरण प्राि नहीं होता है लेखकन
सहज रूप से आसके कल्याणमय स्र्वरुप की साधना ईपासना तथा आनके खर्वश्वखर्वखयात बीज मन्त्र
‘ह्रीं’ के कारण साधको के मर्धय यह खप्रय रही है. भगर्वती से सबंखधत कइ प्रकार के खत्रबीज
प्रयोग है, खजनमे खतन बीज मन्त्र होते है. आनसे सबंखधत खर्वखर्वध मन्त्र खर्वखर्वध फल प्रदान करते है.
भगर्वती के खर्वखर्वध खत्रबीज मंत्रो में से एक मन्त्र कम प्रचलन में रहा है लेखकन यह मन्त्र साधक
को कइ प्रकार के फल की प्राखि करा सकने में समथव है. आस गुढ़ मन्त्र का खर्वस्तार ऄनंत है, तथा
आसकी व्याखया करना ऄसंभर्व कायव ही है. भले ही यह ऄखत सामान्य सा मन्त्र खदखे लेखकन यह
खत्र शखि ऄथावत ज्ञान, आच्छा एर्वं खक्रया में अ रही न्यूनता को तीव्र रूप से दूर करने में समथव है
खजसका ऄनुभर्व साधक प्रयोग के मार्धयम से कर सकता है. एक तरफ यह प्रयोग करने पर
साधक के अंतररक पक्ष में बदलार्व अता है, साधक के नकाराममक खर्वचार हट कर
सकाराममक खर्वचारों की प्राखि होती है तथा अममखर्वश्वास का खर्वकास होता है. साथ ही साथ,
बाह्य रूप से साधक के जीर्वन की न्यूनताओ का क्षय होता है. मुखय रूप से साधक को ऐश्वय
प्राखि में अने र्वाली बाधाओ का खनराकरण होता है. साथ ही साथ साधक को घर-मकान से
सबंखधत कोइ समस्या हो तो ईसका समाधान प्राि होता है. आस द्रखि से यह प्रयोग ऄखत ईत्तम है
क्यों की यह साधक के अतंररक तथा बाह्य रूप में भौखतक दोनों ही पक्षों में लाभ प्रदान करता
है.
यह प्रयोग साधक शुक्ल पक्ष के रखर्वर्वार की राखत्र में सम्प्पन करे.
राखत्र में स्नान अखद से खनर्वृत हो साधक लाल र्वस्त्रों को धारण करे तथा लाल असन पर ईत्तर
की तरफ मुख कर बैठ जाये. ऄपने सामने साधक एक बाजोट रखे.खकसी पात्र में
कुमकुम से
‘ह्रीं’
खलखे. ईसके उपर साधक एक हकीक पमथर रख दे. आसके ऄलार्वा, ऄगर संभर्व हो तो
बाजोट पर साधक को भगर्वती भुर्वनेश्वरी का यंत्र या खचत्र भी रखना चाखहए.
साधक गुरुपूजन, गणेशपूजन सम्प्पन करे तथा आसके बाद ईस पमथर पर ही भुर्वनेश्वरी पूजन
सम्प्पन करे. आसके बाद साधक गुरुमन्त्र का जाप कर न्यास करे.
करन्यास
ह्रां ऄङ्गुिाभयां नमः
ह्रीं तजवनीभयां नमः
ह्रूं मर्धयमाभयां नमः
ह्रैं ऄनाखमकाभयां नमः
ह्रौं कखनिकाभयां नमः
ह्रः करतल करपृिाभयां नमः
अङ्गन्यास
ह्रां रृदयाय नमः
ह्रीं खशरसे स्र्वाहा
ह्रूं खशखायै र्विट्
ह्रैं कर्वचाय ह म
ह्रौं नेत्रत्रयाय र्वौिट्
ह्रः ऄस्त्राय फट्
आसके बाद साधक खनम्पन मन्त्र की १०१ माला ईसी राखत्र में जाप कर ले. मन्त्र में मात्र तीन बीज
है ऄतः १०१ माला जाप में ज्यादा समय नहीं लगता है. यह जाप मूंगामाला, शखि माला या
लाल हकीक माला से करे.
ॎ ह्रीं क्रों
(om hreem krom)
आसके बाद साधक देर्वी को जाप समखपवत करे तथा अशीर्वावद के खलए प्राथवना करे. साधक को
माला का खर्वसजवन नहीं करना है, यह माला अगे भी भुर्वनेश्वरी साधना के खलए ईपयोग में
लायी जा सकती है. हकीक पमथर को पूजा स्थान में स्थाखपत कर ले.
ह्रीं बीज को खलखे हुर्वे
पात्र को धो ले.
BEEJ TRAYATMIKA BHAIRAVI PRAYOG